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मेरे प्यारे मित्राें अब मैं यहीं लिखूंगा

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सम्मान क्या है

इज्जत और सम्मान क्या है?
वो शोषण को सहमति। उसकी अनदेखी है। मौजूदा वक्त में जबतक आप, अपने शोषण को नजरअंंदाज किए रहेंगे तबतक इज्जतदार रहेंगे।

बाजार, समाज, रिश्तेनाते सबों में जबतक आप अपने शोषण को, हां कहते रहेंगे, इज्जतदार रहेंगे। जैसे ही शोषण पर सवाल किया कि शोषक चिढ़ जायेगा और आपको भला-बुरा कहने लगेगा, गालियां देने लगेगा।

बेईमानी सबसे बड़ा शोषण है।

आप बाजार में कम तौलने का विरोध करें , सामान के खराब होने का विरोध करें… सब्जीवाला आपको धोखे से सड़ीगली सब्जियां तौल रहा। आप इससे मना करें तो पक्का है कि बेचनेवालों से आपकी झड़प हो जायेगी। अगर वो संगठित हैं तो गाली गलौज भी आपको सुननी पड़ जायेगी।

कोई व्यक्ति आपको खराब सड़ा हुआ नोट पकड़ा रहा, आप उसका विरोध करिए… उसे वापस करिए कि आपकी इज्जत पर बन जायेगी।

रिश्वत की संस्कृति में अगर आप उससे इंकार करें तो भी आपको बेईज्जत किया जायेगा।

हर वक्त, हर जगह अपने साथ हो रही बेईमानी पर यदि आप चुप रहे तो ही आपकी इज्जत रहेगी। अपने से बेईमानी के विरुद्ध बोले कि बेईज्जत कर दिए जायेंगे।

अब जो व्यक्ति आपका शोषण कर रहा, आपसे बेईमानी कर रहा, वो दरअसल आपको मूर्ख समझ कर, आपकी बेईज्जती ही कर रहा… पर आपकी ये बेईज्जती बस उसकी समझ में और संसार में हैं।

बेईमानों के बीच अगर आप ठग लिए जायेंगे तो बेईमान आपको बेवकूफ बनाने पर आपका खूब परिहास करेंगे… आपको ठग लेने का मजाक उड़ायेंगे। इसमें आपके अनजाने, आपकी एक विचित्र किस्म की बेईज्जती हो रही ही होगी। ठीक जैसे गली मोहल्ले और दफ्तरों में महिलाओं और लड़कियों के बारे में लोग उनके परोक्ष में चटकारे लेकर अपमानजनक तरीके से बातें करते हैं।

अनदेखा शोषण भी बेईज्जती है, जो शोषक पूरी ठसक से परोक्षत: करता रहता है। लेकिन अगर आप इस परोक्ष बेईज्जती का विरोध करें तो शोषण का फरेब पकड़ा जाता है।

फरेबी का फरेब पकड़ा जाना, उसके लिए भीषण अपमानजनक होता है… उसका फरेब पकड़ा गया कि वो खीज, आपको अपमानित करने के लिए अश्लीलता की हद तक मुखर और प्रत्यक्ष हो जायेगा। अब संसार फरेबी का परोक्ष आचरण जानता तो है पर वो आंखे बंद किये रहता है। कौन पड़े टंटे में।

लेकिन जैसे ही फरेबी अश्ललील हो आपकी बेईज्जती करेगा कि संसार आपको पशोषित, पीड़ित और कमजोर समझ लेगा, और आपका उपहास उड़ायेगा।

संसार हमारा उपहास नहीं करे… हम इसी को इज्जत समझते, मानते हैं। पर संसार मतलब क्या? संसार भी तो उन्हीं फरेबियों का संगठन है।

हम हमारे शोषक फरेबियों से बच नहीं सकते। चाहे जैसे भी हो, चाहे कुछ भी कर लें। वे हमारी बेइज्जती करेंगे ही करेंगे।

तो आपकी इज्जत बड़ी अजीब सी चीज है। आपकी बेईज्जती तो अपरिहार्य है, आप कुछ भी ना करें, तो भी वो की जायेगी। आप तटस्थ, निरपेक्ष, शांत और उदासीन रहें तो भी… अगर आप किसी को शोषण करने नहीं दे रहे, तो भी आपकी बेईज्जत की जायेगी कि शोषण नहीं करने देना, संसार को चुनौती देना है। आप बिना शोषित हुए रह ही कैसे सकते हैं।

इज्जत बकवास चीज है। इसकी पूरी अवधारणा, संकल्पना ही शोषण के पोषण के लिए सृजित है। तो इज्जत नहीं अधिकार को लेकर फिक्रमंद होना जरूरी है। जो हमारा अधिकार हनन करे, उसकी हत्या, हमारा हक है। भले ही ये कितना ही अश्लील क्यों ना लगता हो।

समाज सेवा के नाम पर ,क्या क्या खेल करते है लोग

आज भारत में समाज सेवा के रूप में अनेक तरह के तत्व विद्यमान है कोई गौ सेवा के नाम पर सरकारी चारागाह की जमीन पर नजर गडाये है और इसके लिए बाकायदा संस्था का पंजीकरण तथा अन्य कागजात लिए जन प्रतिनिधियों के सिफारिशी पत्र को लेकर समाज सेवा के नाम पर करोडों रूपये के सरकारी जमीन पर नजर गडाये बैठे है विगत चौदह महीने में गौ सेवक अचानक तेजी से पैदा हो गये है जगह जगह गौ सेवा केन्द्र के बोर्ड लग गये है खुद को समाज सेवक के रूप में प्रचारित करने के तमाम हथकन्डे अपनाये जा रहे है पर सेवा के नाम पर सिर्फ सरकारी मुलाजिमों पर मनगढंत आरोप ,हर विकास कार्य में बाधा पैदा करने का हर प्रयास इन तथाकथित समाजसेवियों का धंधा है हर विधायक हर दल के साथ मिलकर केवल अपनी दुकानदारी चमकाने का रोजगार करने वाले खुद को समाज सेवी कहते है । पडोस के किसी गरीब बच्चे को एक कांपी ,किताब कभी नही दिला पायें होंगे पर है समाज सेवी ,आप समाज सेवा करने से पहले पढ लो की समाज क्या है समाज सेवा क्या है ,फिर ये सब करो हर खंभे टंगे है ये युवा समाजसेवी गर इनके हां में हां न मिलाओ तो ये आपको गाली गलौज देंगे आपके व्यक्तिगत व्यवहार पर आछेप लगाएँगे इनकी विचारधारा को समझने के लिए आपको इनके स्तर पर उतरकर सोचना पडेगा तो फिर किनारे ही रहें । एेसे महान समाज सेवी

ग्राम प्रधान के कार्य

देश की करीब 70 फीसदी आबादी गाँवों में रहती है और पूरे देश में दो लाख 39 हजार ग्राम पंचायतें हैं। त्रीस्तरीय पंचायत व्यस्था लागू होने के बाद पंचायतों को लाखों रुपए का फंड सालाना दिया जा रहा है। ग्राम पंचायतों में विकास कार्य की जिम्मेदारी प्रधान और पंचों की होती है। इसके लिए हर पांच साल में ग्राम प्रधान का चुनाव होता है, लेकिन ग्रामीण जनता को अपने अधिकारों और ग्राम पंचायत के नियमों के बारे में पता नहीं होता। बता रहा है गाँव कनेक्शन नेटवर्क… क्या होती है ग्राम पंचायत ? किसी भी ग्रामसभा में 200 या उससे अधिक की जनसंख्या का होना आवश्यक है। हर गाँव में एक ग्राम प्रधान होता है। जिसको सरपंच या मुखिया भी कहते हैं। 1000 तक की आबादी वाले गाँवों में 10 ग्राम पंचायत सदस्य, 2000 तक 11 तथा 3000 की आबादी तक 15 सदस्य हाेने चाहिए। ग्राम सभा की बैठक साल में दो बार होनी जरूरी है। जिसकी सूचना 15 दिन पहले नोटिस से देनी होती है। ग्रामसभा की बैठक बुलाने का अधिकार ग्राम प्रधान को होता है। बैठक के लिए कुल सदस्यों की संख्या के 5वें भाग की उपस्थिति जरूरी होती है। ये भी पढ़ें- ऐसे निकालें इंटरनेट से खसरा खतौनी ग्राम पंचायत के 1/3 सदस्य किसी भी समय हस्ताक्षर करके लिखित रूप से यदि बैठक बुलाने की मांग करते हैं, तो 15 दिनों के अंदर ग्राम प्रधान को बैठक आयोजित करनी होगी। ग्राम पंचायत के सदस्यों के द्वारा अपने में से एक उप प्रधान का निर्वाचन किया जाता है। यदि उप प्रधान का निर्वाचन नहीं किया जा सका हो तो नियत अधिकारी किसी सदस्य को उप प्रधान नामित कर सकता है। ग्राम पंचायत लगातार हो रही हैं सशक्त। फोटो- अभिषेक वर्मा प्रधान और उपप्रधान को अगर पद से हटाना हो सूचना प्राप्त होने के 30 दिन के अंदर जिला पंचायत राज अधिकारी गाँव में एक बैठक बुलाएगा जिसकी सूचना कम से कम 15 दिन पहले दी जाएगी। बैठक में उपस्थित तथा वोट देने वाले सदस्यों के 2/3 बहुमत से प्रधान एवं उप प्रधान को पदमुक्त किया जा सकता है। अगर ग्राम प्रधान या उप प्रधान गाँव की प्रगति के लिए ठीक से काम नहीं कर रहा है तो उसे पद से हटाया भी जा सकता है। समय से पहले पदमुक्त करने के लिए एक लिखित सूचना जिला पंचायत राज अधिकारी को दी जानी चाहिए, जिसमे ग्राम पंचायत के आधे सदस्यों के हस्ताक्षर होने ज़रूरी होते हैं। सूचना में पदमुक्त करने के सभी कारणों का उल्लेख होना चाहिए। हस्ताक्षर करने वाले ग्राम पंचायत सदस्यों में से तीन सदस्यों का जिला पंचायतीराज अधिकारी के सामने उपस्थित होना अनिवार्य होगा। सूचना प्राप्त होने के 30 दिन के अंदर जिला पंचायत राज अधिकारी गाँव में एक बैठक बुलाएगा जिसकी सूचना कम से कम 15 दिन पहले दी जाएगी। बैठक में उपस्थित तथा वोट देने वाले सदस्यों के 2/3 बहुमत से प्रधान एवं उप प्रधान को पदमुक्त किया जा सकता है। ये भी पढ़ें- संसद तक पहुंच गई है ये बात कि महिला प्रधान के पति व बेटे करते हैं कामकाज में हस्तक्षेप कोटेदार अगर नहीं दे रहा है राशन तो भी प्रधान से करें शिकायत। ग्राम पंचायत की समितियां और उनके कार्य 1. नियोजन एवं विकास समिति सदस्य : सभापति, प्रधान, छह अन्य सदस्य अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति, महिला एवं पिछड़े वर्ग का एक-एक सदस्य अनिवार्य होता है। समिति के कार्य: ग्राम पंचायत की योजना का निर्माण करना, कृषि, पशुपालन और ग़रीबी उन्मूलन कार्यक्रमों का संचालन करना। 2. निर्माण कार्य समिति सदस्य: सभापति ग्राम पंचायत द्वारा नामित सदस्य, छह अन्य सदस्य (आरक्षण ऊपर की ही तरह) समिति के कार्य: समस्त निर्माण कार्य करना तथा गुणवत्ता निश्चित करना। 3. शिक्षा समिति सदस्य: सभापति, उप-प्रधान, छह अन्य सदस्य, (आरक्षण उपर्युक्त की भांति) प्रधानाध्यापक सहयोजित, अभिवाहक-सहयोजित करना। समिति के कार्य: प्राथमिक शिक्षा, उच्च प्राथमिक शिक्षा, अनौपचारिक शिक्षा तथा साक्षरता आदि सम्बंधी कार्यों को देखना। 4. प्रशासनिक समिति सदस्य: सभापति-प्रधान, छह अन्य सदस्य आरक्षण (ऊपर की तरह) समिति के कार्य: कमियों-खामियों को देखना। 5. स्वास्थ्य एवं कल्याण समिति सदस्य : सभापति ग्राम पंचायत द्वारा नामित सदस्य, छह अन्य सदस्य (आरक्षण ऊपर की तरह) समिति के कार्य: चिकित्सा स्वास्थ्य, परिवार कल्याण सम्बंधी कार्य और समाज कल्याण योजनाओं का संचालन, अनुसूचित जाति-जनजाति तथा पिछड़े वर्ग की उन्नति एवं संरक्षण। 6. जल प्रबंधन समिति सदस्य: सभापति ग्राम पंचायत द्वारा नामित, छह अन्य सदस्य (आरक्षण ऊपर की तरह) प्रत्येक राजकीय नलकूप के कमांड एरिया में से उपभोक्ता सहयोजित समिति के कार्य : राजकीय नलकूपों का संचालन पेयजल सम्बंधी कार्य देखना। ग्राम पंचायत के कार्य कृषि संबंधी कार्य ग्राम्य विकास संबंधी कार्य प्राथमिक विद्यालय, उच्च प्राथमिक विद्यालय व अनौपचारिक शिक्षा के कार्य युवा कल्याण सम्बंधी कार्य राजकीय नलकूपों की मरम्मत व रखरखाव चिकित्सा एवं स्वास्थ्य सम्बंधी कार्य महिला एवं बाल विकास सम्बंधी कार्य पशुधन विकास सम्बंधी कार्य समस्त प्रकार की पेंशन को स्वीकृत करने व वितरण का कार्य समस्त प्रकार की छात्रवृत्तियों को स्वीकृति करने व वितरण का कार्य राशन की दुकान का आवंटन व निरस्तीकरण पंचायती राज सम्बंधी ग्राम्यस्तरीय कार्य आदि। मनरेगा भी प्रधान के अंतर्गत आता है। ग्राम न्यायालय 12 अप्रैल 2007 को केंद्र सरकार के एक निर्णय के अनुसार ग्रामीण भारत के निवासियों को पंचायत स्तर पर ही न्याय दिलाने के लिए प्रत्येक पंचायत स्तर पर एक ग्राम न्यायालय की स्थापना की जाएगी। इस पर प्रत्येक वर्ष 325 करोड़ रुपए खर्च किए जाएंगे। केंद्र सरकार एवं राज्य सरकारें तीन वर्ष तक इन न्यायालयों पर आने वाला खर्च वहन करेंगी। ग्राम न्यायालयों की स्थापना से अन्य अदालतों में मुकदमों की संख्या कम करने में मदद मिलेगी। ग्राम प्रधान चाहे तो बदल सकता है गांव का हुलिया। ये भी पढ़ें- प्रधानमंत्री जी कोर्ट में नहीं होते इतने केस पेंडिंग, अगर काम कर रही होती न्याय प‍ंचायत

https://www.gaonconnection.com/gaon-chaupal/jaanen-graam-pncaayt-aur-uske-adhikaar?utm_source=mobile-social-share&utm_partner=gaon&utm_campaign=share&utm_medium=facebook

किसी जाति विशेष को गरियाने से पहले कुछ विचार करना जरूरी है भाई मनीष शुक्ला की जानकारी भरी पोस्ट

!!चिंतनीय!!
यह पोस्ट किसी जाति के लिए नहीं वरन ब्राह्मणों के विरुद्ध समाज में फैलाई जा रही नकारात्मकता के बारे में है कृपया धैर्य से पूरा पढ़ें तभी प्रतिक्रिया दें-

क्या आधुनिक भारत में ब्राह्मणों की दुर्दशा तर्कसंगत
है?

जिन लोगों ने भारत को लूटा, तोडा, नष्ट किया, वे आज इस देश में ‘अतीत भुला दो’ के नाम पर सम्मानित हैं और एक अच्छा जीवन जी रहे हैं। जिन्होंने भारत की मर्यादा को खंडित किया, उसके विश्विद्यालयों को विध्वंस किया, उसके विश्वज्ञान के भंडार पुस्तकालयों को जला कर राख किया, उन्हें

आज के भारत में सब सुविधाओं से युक्त सुखी जीवन मिल रहा है। किंतु वे ब्राह्मण जिन्होंने सदैव अपना जीवन देश, धर्म और समाज की उन्नति के लिए अर्पित किया, वे आधुनिक भारत में “काल्पनिक” पुराने पापों के लिए दोषी हैं।

आधुनिक इतिहासकार हमें सिखाते हैं कि भारत के ब्राह्मण सदा से दलितों का शोषण करते आये हैं जो घृणित वर्ण-व्यवस्था के प्रवर्तक भी हैं। ब्राह्मण-विरोध का यह काम पिछले दो शतकों में कार्यान्वित किया गया।
वे कहते हैं कि ब्राह्मणों ने कभी किसी अन्य जाति के लोगों को पढने लिखने का अवसर नहीं दिया। बड़े बड़े विश्वविद्यालयों के बड़े बड़े शोधकर्ता यह सिद्ध करने में लगे रहते हैं कि ब्राह्मण सदा से समाज का शोषण करते आये हैं और आज भी कर रहे हैं, कि उन्होंने हिन्दू ग्रन्थों की रचना केवल इसीलिए की कि वे समाज में अपना स्थान सबसे ऊपर घोषित कर सकें…किंतु यह सारे तर्क खोखले और बेमानी हैं, इनके पीछे एक भी ऐतिहासिक प्रमाण नहीं। एक झूठ को सौ बार बोला जाए तो वह अंततः सत्य प्रतीत होने लगता, इसी भांति इस झूठ को भी आधुनिक भारत में सत्य का स्थान मिल चुका है।

आइये आज हम बिना किसी पूर्व प्रभाव के और बिना किसी पक्षपात के न्याय बुद्धि से इसके बारे सोचे, सत्य घटनायों पर टिके हुए सत्य को देखें। क्योंकि अपने विचार हमें सत्य के आधार पर ही खड़े करने चाहियें, न कि किसी दूसरे के कहने मात्र से। खुले दिमाग से सोचने से आप पायेंगे कि ९५ % ब्राह्मण सरल हैं, सज्जन हैं, निर्दोष हैं। आश्चर्य है कि कैसे समय के साथ साथ काल्पनिक कहानियाँ भी सत्य का रूप धारण कर लेती हैं। यह जानने के लिए बहुत अधिक सोचने की आवश्यकता नहीं कि ब्राह्मण-विरोधी यह विचारधारा विधर्मी घुसपैठियों, साम्राज्यवादियों, ईसाई मिशनरियों और बेईमान नेताओं के द्वारा बनाई गयी और आरोपित की गयी,ताकि वे भारत के समाज के टुकड़े टुकड़े करके उसे आराम से लूट सकें।

सच तो यह है कि इतिहास के किसी भी काल में ब्राह्मण न तो धनवान थे और न ही शक्तिशाली। ब्राह्मण भारत के समुराई नहीं है। वन का प्रत्येक जन्तु मृग का शिकार करना चाहता है, उसे खा जाना चाहता है, और भारत का ब्राह्मण वह मृग है। आज के ब्राह्मण की वह स्थिति है जो कि नाजियों के राज्य में यहूदियों की थी। क्या यह स्थिति स्वीकार्य है? ब्राह्मणों की इस दुर्दशा से किसी को भी सरोकार नहीं, जो राजनीतिक दल हिन्दू समर्थक माने गए हैं, उन्हें भी नहीं;सब ने हम ब्राह्मणों के साथ सिर्फ छलावा ही किया है।

ब्राह्मण सदा से निर्धन वर्ग में रहे हैं! क्या आप ऐसा एक भी उदाहरण दे सकते हैं जब ब्राह्मणों ने पूरे भारत पर शासन किया हो?? शुंग,कण्व ,सातवाहन आदि द्वारा किया गया शासन सभी विजातियों और विधर्मियों को क्यूं कचोटता है? *चाणक्य* ने *चन्द्रगुप्त मौर्य* की सहायता की थी एक अखण्ड भारत की स्थापना करने में। भारत का सम्राट बनने के बाद, चन्द्रगुप्त ,चाणक्य के चरणों में गिर गया और उसने उसे अपना राजगुरु बनकर महलों की सुविधाएँ भोगते हुए, अपने पास बने रहने को कहा। चाणक्य का उत्तर था: ‘मैं तो ब्राह्मण हूँ, मेरा कर्म है शिष्यों को शिक्षा देना और भिक्षा से जीवनयापन करना। क्या आप किसी भी इतिहास अथवा पुराण में धनवान ब्राह्मण का एक भी उदाहरण बता सकते हैं?
श्री कृष्ण की कथा में भी निर्धन ब्राह्मण सुदामा ही प्रसिद्ध है।

संयोगवश, *श्रीकृष्ण* जो कि भारत के सबसे प्रिय आराध्य देव हैं, यादव-वंश के थे, जो कि आजकल *OBC* के अंतर्गत आरक्षित जाति मानी गयी है।
यदि ब्राह्मण वैसे ही घमंडी थे जैसे कि उन्हें बताया जाता है, तो यह कैसे सम्भव है कि उन्होंने अपने से नीची जातियों के व्यक्तियों को भगवान् की उपाधि दी और उनकी अर्चना पूजा की स्वीकृति भी?(उस सन्दर्भ में यदि ईश्वर ब्राह्मण की कृति हैं जैसा की कुछ मूर्ख कहते हैं) देवों के देव *महादेव शिव* को पुराणों के अनुसार *किराट जाति* का कहा गया है, जो कि आधुनिक व्यवस्था में *ST* की श्रेणी में पाए जाते हैं

दूसरों का शोषण करने के लिए शक्तिशाली स्थान की, अधिकार-सम्पन्न पदवी की आवश्यकता होती है। जबकि ब्राह्मणों का काम रहा है या तो मन्दिरों में पुजारी का और या धार्मिक कार्य में पुरोहित का और या एक वेतनहीन गुरु(अध्यापक) का। उनके धनार्जन का एकमात्र साधन रहा है भिक्षाटन। क्या ये सब बहुत ऊंची पदवियां हैं? इन स्थानों पर रहते हुए वे कैसे दूसरे वर्गों का शोषण करने में समर्थ हो सकते हैं? एक और शब्द जो हर कथा कहानी की पुस्तक में पाया जाता है वह है – ‘निर्धन ब्राह्मण’ जो कि उनका एक गुण माना गया है। समाज में सबसे माननीय स्थान संन्यासी ब्राह्मणों का था, और उनके जीवनयापन का साधन भिक्षा ही थी। (कुछ विक्षेप अवश्य हो सकते हैं, किंतु हम यहाँ साधारण ब्राह्मण की बात कर रहे हैं।)
ब्राह्मणों से यही अपेक्षा की जाती रही कि वे अपनी जरूरतें कम से कम रखें और अपना जीवन ज्ञान की आराधना में अर्पित करें। इस बारे में एक अमरीकी लेखक *आलविन टाफलर* ने भी कहा है कि ‘हिंदुत्व में निर्धनता को एक शील माना गया है।’

सत्य तो यह है कि शोषण वही कर सकता है जो समृद्ध हो और जिसके पास अधिकार हों अब्राह्मण को पढने से किसी ने नहीं रोका। श्रीकृष्ण यदुवंशी थे, उनकी शिक्षा गुरु संदीपनी के आश्रम में हुई, श्रीराम क्षत्रिय थे उनकी शिक्षा पहले ऋषि वशिष्ठ के यहाँ और फिर ऋषि विश्वामित्र के पास हुई। बल्कि ब्राह्मण का तो काम ही था सबको शिक्षा प्रदान करना। हां यह अवश्य है कि दिन-रात अध्ययन व अभ्यास के कारण, वे सबसे अधिक ज्ञानी माने गए, और ज्ञानी होने के कारण प्रभावशाली और आदरणीय भी। इसके कारण कुछ अन्य वर्ग उनसे जलने लगे, किंतु इसमें भी उनका क्या दोष यदि विद्या केवल ब्राह्मणों की पूंजी रही होती तो वाल्मीकि जी रामायण कैसे लिखते और तिरुवलुवर तिरुकुरल कैसे लिखते?

और अब्राह्मण संतो द्वारा रचित इतना सारा भक्ति-साहित्य कहाँ से आता? जिन ऋषि व्यास ने महाभारत की रचना की वे भी एक मछुआरन माँ के पुत्र थे। इन सब उदाहरणों से यह स्पष्ट है कि ब्राह्मणों ने कभी भी विद्या देने से मना नहीं किया।

जिनकी शिक्षायें हिन्दू धर्म में सर्वोच्च मानी गयी हैं, उनके नाम और जाति यदि देखी जाए, तो *वशिष्ठ, वाल्मीकि, कृष्ण, राम, बुद्ध, महावीर, कबीरदास, विवेकानंद* आदि, इनमें कोई भी ब्राह्मण नहीं। तो फिर ब्राह्मणों के ज्ञान और विद्या पर एकाधिकार का प्रश्न ही उत्पन्न नहीं होता! यह केवल एक झूठी भ्रान्ति है जिसे गलत तत्वों ने अपने फायदे के लिए फैलाया, और इतना फैलाया कि सब इसे सत्य मानने लगे।

जिन दो पुस्तकों में वर्ण(जाति नहीं) व्यवस्था का वर्णन आता है उनमें पहली तो है मनुस्मृति जिसके रचियता थे *मनु* जो कि एक क्षत्रिय थे, और दूसरी है *श्रीमदभगवदगीता* जिसके रचियता थे *व्यास* जो कि निम्न वर्ग की मछुआरन के पुत्र थे। यदि इन दोनों ने ब्राह्मण को उच्च स्थान दिया तो केवल उसके ज्ञान एवं शील के कारण, किसी स्वार्थ के कारण नहीं।

ब्राह्मण तो अहिंसा के लिए प्रसिद्ध हैं।
पुरातन काल में जब कभी भी उन पर कोई विपदा आई, उन्होंने शस्त्र नहीं उठाया, क्षत्रियों से सहायता माँगी।
बेचारे असहाय ब्राह्मणों को अरब आक्रमणकारियों ने काट डाला, उन्हें गोवा में पुर्तगालियों ने cross पर चढ़ा कर मारा, उन्हें अंग्रेज missionary लोगों ने बदनाम किया, और आज अपने ही भाई-बंधु उनके शील और चरित्र पर कीचड उछल रहे हैं। इस सब पर भी क्या कहीं कोई प्रतिक्रिया दिखाई दी, क्या वे लड़े, क्या उन्होंने आन्दोलन किया?

औरंगजेब ने बनारस, गंगाघाट और हरिद्वार में १५०,००० ब्राह्मणों और उनके परिवारों की ह्त्या करवाई, उसने हिन्दू ब्राह्मणों और उनके बच्चों के शीश-मुंडो की इतनी ऊंची मीनार खडी की जो कि दस मील से दिखाई देती थी, उसने उनके जनेयुओं के ढेर लगा कर उनकी आग से अपने हाथ सेके। किसलिए, क्योंकि उन्होंने अपना धर्म छोड़ कर इस्लाम को अपनाने से मना किया। यह सब उसके इतिहास में दर्ज़ है।

क्या ब्राह्मणों ने शस्त्र उठाया? फिर भी ओरंगजेब के वंशज हमें भाई मालूम होते हैं और ब्राह्मण देश के दुश्मन?

यह कैसा तर्क है, कैसा सत्य है?
कोंकण-गोवा में पुर्तगाल के वहशी आक्रमणकारियों ने निर्दयता से लाखों कोंकणी ब्राह्मणों की हत्या कर दी क्योंकि उन्होंने ईसाई धर्म को मानने से इनकार किया। क्या आप एक भी ऐसा उदाहरण दे सकते हो कि किसी कोंकणी ब्राह्मण ने किसी पुर्तगाली की हत्या की? फिर भी पुर्तगाल और अन्य यूरोप के देश हमें सभ्य और अनुकरणीय लगते हैं और ब्राह्मण तुच्छ! यह कैसा सत्य है?

जब पुर्तगाली भारत आये, तब *St. Xavier* ने पुर्तगाल के राजा को पत्र लिखा “यदि ये ब्राह्मण न होते तो सारे स्थानीय जंगलियों को हम आसानी से अपने धर्म में परिवर्तित कर सकते थे।” यानि कि ब्राह्मण ही वे वर्ग थे जो कि धर्म परिवर्तन के मार्ग में बलि चढ़े। जिन्होंने ने अपना धर्म छोड़ने की अपेक्षा मर जाना बेहतर समझा। *St. Xavier* को ब्राह्मणों से असीम घृणा थी, क्योंकि वे उसके रास्ते का काँटा थे,
हजारों की संख्या में गौड़ सारस्वत कोंकणी ब्राह्मण उसके अत्याचारों से तंग हो कर गोवा छोड़ गए, अपना सब कुछ गंवा कर। क्या किसी एक ने भी मुड़ कर वार किया? फिर भी *St. Xavier* के नाम पर आज भारत के हर नगर में स्कूल और कॉलेज है और भारतीय अपने बच्चों को वहां पढ़ाने में गर्व अनुभव करते हैं
इनके अतिरिक्त कई हज़ार सारस्वत ब्राह्मण काश्मीर और गांधार के प्रदेशों में विदेशी आक्रमणकारियों के हाथों मारे गए। आज ये प्रदेश अफगानिस्तान और पाकिस्तान कहलाते हैं, और वहां एक भी सारस्वत ब्राह्मण नहीं बचा है। क्या कोई एक घटना बता सकते हैं कि इन प्रदेशों में किसी ब्राह्मण ने किसी विदेशी की हत्या की? हत्या की छोडिये, क्या कोई भी हिंसा का काम किया?

और आधुनिक समय में भी इस्लामिक आतंकवादियों ने काश्मीर घाटी के मूल निवासी ब्राह्मणों को विवश करके काश्मीर से बाहर निकाल दिया। ५००,००० काश्मीरी पंडित अपना घर छोड़ कर बेघर हो गए, देश के अन्य भागों में शरणार्थी हो गये, और उनमे से ५०,००० तो आज भी जम्मू और दिल्ली के बहुत ही अल्प सुविधायों वाले अवसनीय तम्बुओं में रह रहे हैं। आतंकियों ने अनगनित ब्राह्मण पुरुषों को मार डाला और उनकी स्त्रियों का शील भंग किया। क्या एक भी पंडित ने शस्त्र उठाया, क्या एक भी आतंकवादी की ह्त्या की? फिर भी आज ब्राह्मण शोषण और अत्याचार का पर्याय माना जाता है और मुसलमान आतंकवादी वह भटका हुआ इंसान जिसे क्षमा करना हम अपना धर्म समझते हैं। यह कैसा तर्क है?

माननीय भीमराव अंबेडकर जो कि भारत के संविधान के तथाकथित रचियता (प्रारूप समिति के अध्यक्ष) थे, उन्होंने एक मुसलमान इतिहासकार का सन्दर्भ देकर लिखा है कि धर्म के नशे में पहला काम जो पहले अरब घुसपैठिया मोहम्मद बिन कासिम ने किया, वो था ब्राह्मणों का खतना। “किंतु उनके मना करने पर उसने सत्रह वर्ष से अधिक आयु के सभी को मौत के घाट उतार दिया।” मुग़ल काल के प्रत्येक घुसपैठ, प्रत्येक आक्रमण और प्रत्येक धर्म-परिवर्तन में लाखों की संख्या में धर्म-प्रेमी ब्राह्मण मार दिए गए। क्या आप एक भी ऐसी घटना बता सकते हो जिसमें किसी ब्राह्मण ने किसी दूसरे सम्प्रदाय के लोगों की हत्या की हो?

१९वीं सदी में मेलकोट में दिवाली के दिन टीपू सुलतान की सेना ने चढाई कर दी और वहां के ८०० नागरिकों को मार डाला जो कि अधिकतर मंडयम आयंगर थे। वे सब संस्कृत के उच्च कोटि के विद्वान थे। (आज तक मेलकोट में दिवाली नहीं मनाई जाती।) इस हत्याकाण्ड के कारण यह नगर एक श्मशान बन गया। ये अहिंसावादी ब्राह्मण पूर्ण रूप से शाकाहारी थे, और सात्विक भोजन खाते थे जिसके कारण उनकी वृतियां भी सात्विक थीं और वे किसी के प्रति हिंसा के विषय में सोच भी नहीं सकते थे। उन्होंने तो अपना बचाव तक नहीं किया। फिर भी आज इस देश में टीपू सुलतान की मान्यता है। उसकी वीरता के किस्से कहे-सुने जाते हैं। और उन ब्राह्मणों को कोई स्मरण नहीं करता जो धर्म के कारण मौत के मुंह में चुपचाप चले गए।

अब जानते हैं आज के ब्राह्मणों की स्थिति क्या आप जानते हैं कि बनारस के अधिकाँश रिक्शा वाले ब्राह्मण हैं? क्या आप जानते हैं कि दिल्ली के रेलवे स्टेशन
पर आपको ब्राह्मण कुली का काम करते हुए मिलेंगे?
दिल्ली में पटेलनगर के क्षेत्र में 50 % रिक्शा वाले ब्राह्मण समुदाय के हैं। आंध्र प्रदेश में ७५ % रसोइये और घर की नौकरानियां ब्राह्मण हैं। इसी प्रकार देश के दुसरे भागों में भी ब्राह्मणों की ऐसी ही दुर्गति है, इसमें कोई शंका नहीं। गरीबी-रेखा से नीचे बसर करने वाले ब्राह्मणों का आंकड़ा ६०% है।

हजारों की संख्या में ब्राह्मण युवक अमरीका आदि पाश्चात्य देशों में जाकर बसने लगे हैं क्योंकि उन्हें वहां software engineer या scientist का काम मिल जाता है। सदियों से जिस समुदाय के सदस्य अपनी कुशाग्र बुद्धि के कारण समाज के शिक्षक और शोधकर्ता रहे हैं, उनके लिए आज ये सब कर पाना कोई बड़ी बात नहीं। फिर भारत सरकार को उनके सामर्थ्य की आवश्यकता क्यों नहीं ? क्यों भारत में तीव्र मति की अपेक्षा मंद मति को प्राथमिकता दी जा रही है? और ऐसे में देश का विकास होगा तो कैसे?

कर्नाटक प्रदेश के सरकारी आंकड़ों के अनुसार वहां के
वासियों का आर्थिक चित्रण कुछ ऐसा है: ईसाई भारतीय – १५६२ रू/ वोक्कालिग जन – ९१४ रू/ मुसलमान – ७९४ रू/ पिछड़ी जातियों के जन – ६८० रू/ पिछड़ी जनजातियों के जन – ५७७ रू/ और ब्राह्मण – ५३७ रू। तमिलनाडु में रंगनाथस्वामी मन्दिर के पुजारी का मासिक वेतन ३०० रू और रोज का एक कटोरी चावल है। जबकि उसी मन्दिर के सरकारी कर्मचारियों का वेतन कम से कम २५०० रू है। ये सब ठोस तथ्य हैं लेकिन इन सब तथ्यों के होते हुए, आम आदमी की यही धारणा है कि पुजारी ‘धनवान’ और ‘शोषणकर्ता’ है, क्योंकि देश के बुद्धिजीवी वर्ग ने अनेक वर्षों तक इसी असत्य को अनेक प्रकार से चिल्ला चिल्ला कर सुनाया है।

क्या हमने उन विदेशी घुसपैठियों को क्षमा नहीं
किया जिन्होंने लाखों-करोड़ों हिंदुओं की हत्या की और देश को हर प्रकार से लूटा? जिनके आने से पूर्व भारत संसार का सबसे धनवान देश था और जिनके आने के बाद आज भारत पिछड़ा हुआ third world country कहलाता है। इनके दोष भूलना सम्भव है तो अहिंसावादी, ज्ञानमूर्ति, धर्मधारी ब्राह्मणों को किस बात का दोष लगते हो कब तक उन्हें दोष देते जाओगे?

क्या हम भूल गए कि वे ब्राह्मण समुदाय ही था जिसके कारण हमारे देश का बच्चा बच्चा गुरुकुल में बिना किसी भेदभाव के समान रूप से शिक्षा पाकर एक योग्य नागरिक बनता था? क्या हम भूल गए कि ब्राह्मण ही थे जो ऋषि मुनि कहलाते थे, जिन्होंने विज्ञान को अपनी मुट्ठी में कर रखा था?

भारत के स्वर्णिम युग में ब्राह्मण को यथोचित सम्मान दिया जाता था और उसी से सामाज में व्यवस्था भी ठीक रहती थी। सदा से विश्व भर में जिन जिन क्षेत्रों में भारत का नाम सर्वोपरी रहा है और आज भी है वे सब ब्राह्मणों की ही देन हैं, जैसे कि अध्यात्म, योग, प्राणायाम, आयुर्वेद आदि। यदि ब्राह्मण जरा भी स्वार्थी होते तो यह सब अपने था अपने कुल के लिए ही रखते दुनिया में मुफ्त बांटने की बजाए इन की कीमत वसूलते। वेद-पुराणों के ज्ञान-विज्ञान को अपने मस्तक में धारने वाले व्यक्ति ही ब्राह्मण कहे गए और आज उनके ये सब योगदान भूल कर हम उन्हें दोष देने में लगे है।

जिस ब्राह्मण ने हमें मन्त्र दिया *‘वसुधैव कुटुंबकं’* वह
ब्राह्मण विभाजनवादी कैसे हो सकता है? जिस ब्राह्मण ने कहा *‘लोको सकलो सुखिनो भवन्तु’* वह किसी को दुःख कैसे पहुंचा सकता है? जो केवल अपनी नहीं , केवल परिवार, जाति, प्रांत या देश की नहीं बल्कि सकल जगत की मंगलकामना करने का उपदेश देता है, वह ब्राह्मण स्वार्थी कैसे हो सकता है?

इन सब प्रश्नों को साफ़ मन से, बिना पक्षपात के विचारने की आवश्यकता है, तभी हम सही उत्तर जान पायेंगे।

आज के युग में ब्राह्मण होना एक दुधारी तलवार पर चलने के समान है। यदि ब्राह्मण अयोग्य है और कुछ अच्छा कर नहीं पाता तो लोग कहते हैं कि देखो हम तो पहले ही जानते थे कि इसे इसके पुरखों के कुकर्मों का फल मिल रहा है। यदि कोई सफलता पाता है तो कहते हैं कि इनके तो सभी हमेशा से ऊंची पदवी पर बैठे हैं, इन्हें किसी प्रकार की सहायता की क्या आवश्यकता? अगर किसी ब्राह्मण से कोई अपराध हो जाए फिर तो कहने ही क्या, सब आगे पीछे के सामाजिक पतन का दोष उनके सिर पर मढने का मौका सबको मिल जाता है। कोई श्रीकांत दीक्षित भूख से मर जाता है तो कहते हैं कि बीमारी से मरा। और ब्राह्मण बेचारा इतने दशकों से अपने अपराधों की व्याख्या सुन सुन कर ग्लानि से इतना झुक चूका है कि वह कोई प्रतिक्रिया भी नहीं करता, बस चुपचाप सुनता है और अपने प्रारब्ध को स्वीकार करता है।

बिना दोष के भी दोषी बना घूमता है आज का ब्राह्मण। नेताओं के स्वार्थ, समाज के आरोपों, और देशद्रोही ताकतों के षड्यंत्र का शिकार हो कर रह गया है ब्राह्मण। बहुत से ब्राह्मण अपने पूर्वजों के व्यवसाय को छोड़ चुके हैं आज। बहुत से तो संस्कारों को भी भूल चुके हैं । अतीत से कट चुके हैं किंतु वर्तमान से उनको जोड़ने वाला कोई नहीं। ऐसे में भविष्य से क्या आशा?

किसी से मिलने से उसके गुण दोष खुद में नही आते

#चंदन_विष_व्यापत_नहीं_लिपटत_रहे_भुजंग

कल भारत के पूर्व राष्ट्रपति प्रणव मुख़र्जी संघ के मंच पर थे । संघ को और प्रणव दा को पता था की उनकी ये जुगलबंदी चर्चा का विषय है ।
हमारे देश में एक रवायत बेहद तेज़ी से विकसित हो रही है -स्वयं को सर्वोपरी और सर्वज्ञाता समझने की । इसमें सबसे बड़ा योगदान सोशल मीडिया और राजनीतिक दलों का है ।राजनीतिक दलों ने अपनी -अपनी I T सेल को काफ़ी सशक्त बना रखा है । I T सेल के कारिंदों की एक पुरी फ़ौज 24 घंटे सोशल मीडिया पर मौज़ूद लोगों के मस्तिष्क को पढ़ती और फ़िर उससे खेलती रहती है । उन्हें पता है की सोशल मीडिया से लेकर गाँव और शहरों के चौक -चौराहों तकचर्चा को हवा देने वाले फ़ालतू और बेकार किस्म के लोगों की एक बड़ी तादाद इन दिनों सोशल मीडिया की गलियों में विचरती रहती है । I T के प्रोफेशनल पैसे लेकर इन्हीं आवारा से घूमते महामानवो को निःशुल्क अपनी फ़ौज में शामिल करने में जुटे रहते हैं । अपनी -अपनी विचारधारा से जुड़े लोगों को ये विश्वास दिलाते हैं की तुम इसी विचार पर डटे रहो …..तुम सर्वोपरी हो ……सर्वज्ञानी हो । ये I T सेल इंसान के वैचारिक पुनर्वालोकन के सभी रास्ते बंद करते हैं । और इनके प्रभाव से ग्रस्त ये स्वघोषित -स्वपोषित मठाधीश जुट जाते हैं अपने -अपने कार्यों में । कोई संघ जैसी वृहद और अनुशासित संस्था की लानत -मनालत करने लगता है तो कोई प्रणव दा जैसे अनुभवी राजनीतिज्ञ और व्यक्तित्व को धर्म और कर्म गुरु बन दिशा दिखाने लगता है की उन्हें क्या करना चाहिए और क्या नहीं करना चाहिए तो कोई संघ के बहाने ये बताने में जुट जाता है की असली हिंदुत्व क्या है ? ना जाने क्यूँ मुझे ये लगता है भारत के मासूम लोगों पर मानसिक हमले कर उनकी सोचने -समझने की आज़ादी छीनी जा रही है !
ख़ैर, आइये देखते हैं कल प्रणव दा ने संघ के मंच से क्या -क्या बातें की ……कल प्रणव दा ने संघ के मंच से भारत के लोकतांत्रिक मूल्यों की बात की , अनेकता में एकता की बात की , राष्ट्र धर्म की बात की , भारत के गौरवशाली इतिहास की बात की , भारत की मजबूत और सशक्त संस्कृति की बात की ,भारतीय सम्विधान की बात की , सर्वधर्म समभाव की बात की , कौटिल्य की बात की , सम्राट अशोक की बात की , लोकमान्य तिलक की बात की ………..वर्षों से भारतीय समाज और भारतीय राजनीति में तपे -तपाये और देश के सर्वोच्च पद पर रह चुके प्रणव दा ने पद की गरिमा और मेजबान के सम्मान का पुरा ख्याल रखते हुए एक सारगर्भित भाषण दिया । उन्होंने वही बातें कहीं जो हम सबने बचपन से लेकर अब तक सैकड़ों बार पढ़ी और सुनी होंगी । उन्होंने कुछ भी ऐसा नहीं कहा जो विवादित हो या किसी का दिल दुःखाने वाला हो ।

दूसरी और संघ प्रमुख मोहन भागवत ने भी अपने विशाल हृदय का परिचय देते हुए और मेहमान के सम्मान का पूर्ण ख़याल रखते हुए बेहद संतुलित भाषण दिया । उन्होंने संघ को सभी भारतीय समाज का संगठन बताते हुए राष्ट्र प्रेम की बात की , संगठन की बात की , विचारों की विभिन्नता के बावज़ूद एकता की बात की , सामाजिक सोच के गठन की बात की , लोकतांत्रिक मूल्यों की बात की , एकता की बात की, सहिष्णुता की बात की और संघ के अपने संगठन की वृहत्तर सोच की बात की ……
मेजबान और मेहमान दोनों ने ही एक -दूसरे की भावनाओं , सोच , परिस्थितियों का पूर्ण सम्मान करते हुए एक वृहद फ़लक पर सार्थक संदेश दिया । दोनों इस कार्य के लिए प्रशंसा के पात्र हैं और सम्मान के हक़दार भी ….

अब इन राजनीतिक दलों और उनके के I T सेल का कार्य देखिये -वे शब्दों को संकेत के आवरण में लपेट कर इसे एक -दूसरे पर तमाचा बताने में जुटे हैं । वे नहीं चाहते के दो अलग विचारधाराओं के इस समागम से बने एक विशाल फ़लक को हम देखें , वो नहीं चाहते की हम उनके द्वारा ग्रसित किये गये पूर्वाग्रहों से मुक्त हो विचारों के उस उन्मुक्त आकाश तले पहुँचे जहाँ सभी विचारों का स्वागत हो इसलिए इन दोनों भाषणों के शब्दों में विष लपेट वे हमें समझाने की कोशिश कर रहें हैं । वे अब भी हम पर मानसिक हमले की उस नीति पर दृढ़ हो आगे बढ़ रहें हैं जिसके द्वारा वो नाकारात्मकता के एक सीमित दायरे में हमें बाँधे रखना चाहते हैं ।

राजनीति के इस दौर में जब विचारधाराएं घृणा , नफ़रत , अपशब्दों , सामाजिक विद्वेष जैसे हथियारों से लैस हो एक -दूसरे पर हमलावर हैं ऐसे में यूँ विपरीत दिखने वाली विचारधाराओं का एक मंच पर आकर राष्ट्रहित और राष्ट्रीयता की बात करना स्वागत योग्य कदम है , सार्थक पहल है , हर्ष की बात है ………..इसे विषाक्त न होने दें । धन्यवाद दें उन महामानवो को जिन्होंने वैचारिक विभिन्नता के प्रति सहिष्णु होने का संदेश दिया है

घृणा , विद्वेष और हिंसा से दूर होना है तो एक बार खड़े होकर इन I T सेल वालों से कह दीजिए न ….

#चंदन_विष_व्यापत_नहीं_लिपटत_रहे_भुजंग

रात के बाद सुबह होगी, बात के बाद बात होगी

हर मुश्किल के बाद खुशनुमा पल आते हैं,जब हम मुस्कुराते है,तो निराश न हो आज सफल नही हुए तो क्या हुआ उदास होकर हम घर बैठ जाये अरे गुनगुनाओ ये पंक्ति और दुगने जोश से जुट जाओ अपने मिशन पर फतेह आपकी ही होगी ……नर हो न निराश करो मन को

एक नामी नेता का गुमनाम हो जाना

पूर्व रक्षामंत्री श्री जॉर्ज फर्नांडीस जी इस वक़्त अल्ज़ाइमर नाम की बीमारी की गिरफ़्त में हैं और सात स्टेज वाली इस बीमारी के छठी स्टेज में हैं। उन्होंने मशहूर कांग्रेसी नेता हुमायूं कबीर की बेटी लैला कबीर से शादी की। एक बेटा भी हुआ लेकिन बावजूद उसके पच्चीस साल लैला कबीर जॉर्ज से अलग विदेश में रहीं और कभी उन्होंने जॉर्ज की ज़िंदगी में नहीं झांका। जॉर्ज की लोकसभा चुनाव में हार के बाद बुरी हालत हो गई थी और उनके पास रहने का भी कोई ठिकाना नहीं था। मुंबई की यूनियन के साथियों ने उनके लिए हौजखास में एक मकान ख़रीदा था, पर मकान का टाइटिल यूनियन के नाम था इसलिए वो उसमे भी नहीं जा पा रहे थे। अचानक ख़बर आई कि बंगलौर में जॉर्ज की मां के नाम ज़मीन का एक टुकड़ा है, जो इसलिए ख़रीदा गया था कि बुढ़ापे में जॉर्ज वहां रहकर समाज सेवा केंद्र चलाएंगे। जॉर्ज के भाइयों ने उस पर से अपना हक़ वापस ले लिया और वह ज़मीन जॉर्ज को मिल गई। उस ज़मीन को बेचने से सोलह करोड़ रुपये मिले, जिसमें टैक्स काटने के बाद तेरह करोड़ उनके खाते में आ गए। अब जॉर्ज करोड़पति हो गए।
अचानक लैला कबीर(भाई अल्तमश कबीर सुप्रीम कोर्ट में जज रहे हैं) लैला फर्नांडिस बनकर भारत आ गईं और उन्हें एक बड़े झगडे के बाद दिल्ली वापस लाकर अपने मकान में रखा है।

जबरदस्त समाजवादी, भारत में पहली बार तीन दिनों की मुक़म्मल रेल हड़ताल के मुखिया, लोकसभा में धाकड़ स्पीकर, कोकाकोला को भारत से जाने पर विवश करने वाले जॉर्ज फर्नांडीस अब कहाँ और कैसे है किसी को पता नहीं।

*सच कहा है किसी ने ‘जिंदगी बड़ी अहसानफरामोश होती है, आप उसे जीते हैं और वो आपको मारती है।’

कैसी कैसी धारणा है

माहवारी क्या है?

माहवारी 10-12 उम्र से शुरू होकर 45-50 साल तक स्त्रियों के शरीर में होने वाली स्वाभाविक बायोलॉजिकल प्रक्रिया है! इस प्रकिया में मानव शिशु बनने के लिए अनिवार्य अंडा बनता है और उस अंडे के निषेचित होने के बाद उसके पोषण के लिए आधार (परत) तैयार होता है! लेकिन जब अंडा उस माह निषेचित नहीं होता तो अंडे समेत ये परत शरीर से बाहर स्रावित कर दी जाती है जिससे कि यही प्रक्रिया अगले महीने फिर दोहरायी जा सके! इसी स्राव (जो 4 से 5 दिन तक होता है) को मासिक स्राव कहते हैं! बस इतनी सी बात है! यह एकदम प्राकृतिक प्रक्रिया है जो अगर न घटित हो तो हम आपमें से कोई नहीं होता! माहवारी कोई बीमारी नहीं, बल्कि स्त्री देह के स्वस्थ होने का प्रतीक है. ये स्राव न तो ‘अशुद्ध’ होता है और न ही अनहाइजीनिक!

इससे जुड़ी भ्रांतियां और अंधविश्वास:

हमारे समाज में माहवारी को जैसे महामारी ही बना दिया गया है: पूजा मत करो वरना भगवान गंदे हो जायेंगे, गाय को मत छुओ वरना वो बछड़ा पैदा नहीं कर सकेगी, पौधों को मत छुओ वरना उनमें फल नहीं आयेंगे, अचार मत छुओ वरना ख़राब हो जायेगा, किसी देव स्थान या पवित्र जगह पे मत जाओ वरना सब अपवित्र हो जायेगा, शीशा मत देखो उसकी चमक फीकी पड़ जाएगी, मासिक स्राव वाला कपड़ा छुपा के रखो कोई देख लेगा तो? इसके बारे में घर में सिर्फ़ माँ या बहन से बात करो और किसी से नहीं! समाज में माहवारी के लाल धब्बों को लेकर बहुत ही घटिया मानसिकता है! मैंने तो यहाँ तक सुना है कि शहरों में कुछ घरों में धार्मिक कर्मकाण्डों के लिये माहवारी को दवा द्वारा थोड़ा आगे खिसका देते हैं!
हालाँकि कुछ समाजों में पहली माहवारी पे लड़कियों को पूजा जाता है और इस प्रक्रिया को शुभ माना जाता है तो कुछ एक समाजों में घर के दक्षिण में किसी छोटे से दड़बे में दो-तीन दिन के लिए लड़की को बंद कर दिया दिया जाता है! लेकिन अधिकांश तथाकथित ‘सभ्य’ समाजों में ये आज भी माहवारी के साथ शर्म, कल्चर ऑफ़ साइलेंस, अपशकुन, अपवित्रता, अशुद्धता जैसे अंधविश्वास और मिथक जुड़े हैं!

इन भ्रांतियों और अंधविश्वासों का सामाजिक असर:

दरअसल माहवारी स्वास्थ्य का मामला है! इससे जुड़ा शर्म, अंधविश्वास, छिपाने की मजबूरी इसे घातक रूप दे देती है! साफ़ कपड़ा अथवा पैड इस्तेमाल न करने से संक्रमण हो सकते हैं. ये मानवाधिकार का भी मामला है क्योंकि इसके साथ साथ जुड़ी भ्रांतियां, अंधविश्वास, तिरस्कार, भेदभाव इत्यादि व्यक्तिगत स्वतंत्रता व सम्मान के ख़िलाफ़ हैं! इसके कारण समाज अक्सर महिलाओं की ‘मोबिलिटी’ कम कर देती है, जेंडर-रोल्स तय करता है! ये समाज में महिलाओं को पुरुषों से कमतर मानने की एक अवैज्ञानिक परंपरागत धार्मिक-मर्दवादी सोच है! आज भी मेडिकल स्टोर से सेनेटरी पैड खरीदने में झिझक देखी जाती है! डॉक्टर सेनेटरी पैड काले रंग की पॉलिथीन में देता है! घर में सेनेटरी पैड पापा या भाई से कम ही मंगाया जाता है! इन सबके कारण आज भी ग्रामीण इलाकों में बहुत सी लड़कियाँ/महिलायें सेनेटरी पैड इस्तेमाल ही नहीं करतीं!
औसतन 28 दिन की इस प्रकिया से कुल आबादी की 53% स्त्रियाँ गुज़रती हैं! ग्रामीण इलाकों में लड़कियों के स्कूलों से ड्रापआउट के कारणों में माहवारी को छुपाने तथा इससे जुडी स्वास्थ्य सुविधायें या अलग टॉयलेट न होना भी एक बड़ा कारण है! महिला शिक्षकों या कर्मचारियों को आये दिन असहज इसके कारण असहज अथवा शर्मिंदा होना पड़ता है, कामचोरी का आरोप अलग से! किशोरावस्था व प्रौढावस्था में मासिक स्राव के कारण क़रीब 60% महिलाओं को दर्द हो सकता है लेकिन इससे जुड़ा शर्म, तिरस्कार, अपवित्रता कि सोच इसे स्त्रियों के ऊपर अत्याचार में बदल देता है.

हमें क्या करना चाहिए?

ये सोच बदलना होगा! हम सबको! घर में अपने बच्चों को इसके बारे में बचपन से ही बताना शुरू करें! इतना जागरूक करिए कि जैसे सर दर्द के लिए हम डॉक्टर से क्रोसिन माँगते हैं उसी तरह सेनेटरी पैड मांग सकें! इतना कि भाई बहन के लिए, पिता बेटी के लिए बेझिझक पैड ला सके! बहन खुलकर ये बात भाई और बाप से कह सके! फैमिली में माहवारी के दौरान होने वाला चिड़चिड़ापन, दर्द, मूड स्विंग, क्रंप आदि पर बात करना चाहिए ताकि बेटा आगे चलकर समाज में किसी भी स्त्री के प्रति संवेदनशील बन सके! पुराने घटिया सोच, अंधविश्वास, भ्रान्ति को दूर करें! टैम्पोन, पैड, घर में बने साफ़ कपड़ों का नैपकिन, मेन्स्त्रुअल कप इत्यादि के बारे में जानकारी बढायें! डॉक्टर से सलाह लें और साथ बेटी और बेटे दोनों को ले जायें!
समाज को इतना सहज बनाना होगा कि कोई स्त्री माहवारी के दौरान परेशानी होने पर बेझिझक सीट माँग सके! और अगर लाल धब्बा दिख भी जाये तो हाय-तौबा के बजाय नॉर्मल बात हो! ताकि जब कभी किसी ऑफिस या संस्था में कोई लड़की माहवारी के दर्द के चलते छुट्टी माँगे तो उसपे ताने न कसे जायें, उसपे कामचोरी का बेहूदा इल्ज़ाम न लगे! माहवारी जैसी प्राकृतिक प्रकिया के कारण अगर स्त्री को समाज में सिमटकर चलना पड़े, शर्मिंदगी उठानी पड़े, या असहज होना पड़े तो ये किसी भी समाज के लिए शर्मनाक है! जिस प्रकिया के द्वारा पूरी मानव जात पैदा होती है उसको अपवित्र या अशुद्ध कहना समाज का दोगलापन है! इसे अपवित्र और अशुद्ध कहके आधी आबादी को नीचा दिखाना हुआ! बच्चा जब पैदा होता है तो यही रक्त बच्चे के कान, मुँह, नाक में घुसी होती है जिसको नर्स या दाई उंगली डालके निकालती है. हर बच्चा इसी में सना पैदा होता है! तो सोचो ये अपवित्र या तिरस्कार योग्य चीज़ कैसे हो सकती है? यह स्त्री जननांगों की एक स्वाभाविक जैववैज्ञानिक प्रक्रिया है. ये न तो बीमारी नहीं और न ही समस्या है! इसका धर्म से कोई लेना देना नहीं!

नेहरू के ख़िलाफ़ किए जा रहे दुष्प्रचार की वजह क्या है?

जवाहर लाल नेहरू की असफलताएं भी गिनाई जा सकती हैं, लेकिन उसके पहले आपको नेहरू का इस देश के निर्माण में महान योगदान भी स्वीकारना होगा.नेहरू जयंती के मौके पर नेहरू को एक बार फिर कोसने का मौका है. अगर आप इतिहास के जानकार दिखना चाहते हैं तो इस देश की सारी समस्याओं की जड़ नेहरू को करार दे दीजिये. बात चाहे कश्मीर की हो या फिर भारत के बंटवारे की या आजाद भारत के इतिहास की किसी भी समस्या की- नेहरू सबके सामान्य खलनायक हैं.नेहरू के खिलाफ फैलाये जा रहे दुष्प्रचार की वजहें साफ हैं. आरएसएस भारत के स्वाधीनता संघर्ष के इतिहास को बदनाम करना चाहती है. इस इतिहास के तमाम नायकों में उसके सबसे बड़े तीन दुश्मन हैं- गांधी, नेहरू और सरदार पटेल.लेकिन आरएसएस चाहकर भी गांधीजी पर सीधा हमला करने की स्थिति में नहीं है. इसलिए उसकी रणनीति दोतरफा है- नेहरू की चारित्रिक हत्या कर दो और उनको सरदार पटेल का सबसे बड़ा दुश्मन बना दो.अगर आप आज सोशल मीडिया पर फैलाये जा रहे दुष्प्रचार का यकीन करें तो नेहरू ने न सिर्फ पटेल बल्कि उनके पूरे खानदान के साथ दुश्मनी निभाई.अगर आप आज सोशल मीडिया पर फैलाये जा रहे दुष्प्रचार का यकीन करें तो नेहरू ने न सिर्फ पटेल बल्कि उनके पूरे खानदान के साथ दुश्मनी निभाई.अफवाहों के सांप्रदायिक प्रचार-तंत्र ने झूठ को सच बनाने का आसान रास्ता चुना है. उसने झूठ का ऐसा जाल बुना है कि आम आदमी की याददाश्त से यह बात गायब हो चुकी है कि नेहरू सच में कौन थे. आज की नई पीढ़ी जिसकी सबसे बड़ी लाइब्रेरी इंटरनेट है, यूट्यूब वाले नेहरू को जानती है.उस नेहरू को जो औरतों का बेहद शौकीन कामुक व्यक्ति था. जिसने एडविना माउंटबेटन के प्यार में पड़कर भारत के भविष्य को अंग्रेजों के हाथों गिरवीं रख दिया. यहां तक यह भी नेहरू की मौत इन्हीं वजहों से यानी एसटीडी (सेक्सुअली ट्रांसमिटेड डिसीज) से हुई थी.इसके अलावा नेहरू सत्तालोलुप हैं. नेहरू गांधी की कृपा से प्रधानमंत्री बने वरना सरदार पटेल आजाद भारत के पहले प्रधानमंत्री होते. यह ऐसा आरोप है जिसका कोई ऐतिहासिक साक्ष्य नहीं है. लेकिन आरएसएस विचारक नाम से मशहूर कई लोग हर टीवी शो में यह झूठ बार-बार दोहराते हैं.वो जिस वाकये की टेक लेकर यह अफवाह गढ़ते हैं उसमें बात पटेल के प्रधानमंत्री होने के बजाय कांग्रेस अध्यक्ष होने की थी. इस बात का प्रधानमंत्री पद से दूर-दूर का वास्ता नहीं था.1940 के बाद 1946 तक मौलाना आजाद कांग्रेस के अध्यक्ष बने रहे क्योंकि भारत छोड़ो आंदोलन और उसकी वजह से कांग्रेस को गैरकानूनी घोषित करने की वजह से चुनाव नहीं कराये जा सके. उसके बाद आचार्य कृपलानी कांग्रेस के अध्यक्ष बने और प्रधानमंत्री पद को लेकर कोई ऐसा विवाद कभी हुआ ही नहीं.आजादी के पहले और आजादी के बाद दो अलग-अलग दौर थे. पहले दौर में गांधी के व्यापक नेतृत्व में एक भरी-पूरी कांग्रेस थी. जिसमें नेहरू गांधी के बाद बिना शक नंबर दो थे. गांधी के बाद वही जनता के दिलों पर सबसे ज्यादा राज करते थे.गांधी की हत्या के बाद वो निस्संदेह कांग्रेस के सबसे बड़े नेता थे जिसे सरदार पटेल भी स्वीकार करते थे. दोनों के बीच कई मुद्दों पर गंभीर वैचारिक मतभेद थे लेकिन आखिरकार वो दोनों एक ही राजनीतिक दल के दो सबसे बड़े स्तम्भ थे.सरदार पटेल की 1950 में आकस्मिक मृत्यु के पहले तक आजाद भारत के पुनर्निर्माण के काम में लगभग सब कुछ नेहरू और पटेल का साझा प्रयास था. रियासतों के एकीकरण के काम में सरदार पटेल और वीपी मेनन की भूमिका किसी से छिपी नहीं है. लेकिन भारत का एकीकरण आजादी की लड़ाई का मूल विचार था. जिस देश को पिछले सौ सालों में जोड़ा-बटोरा गया था, उसे सैकड़ों छोटी-बड़ी इकाइयों में टूटने नहीं देना था.आजादी के बाद यह काम आजाद भारत की सरकार के जिम्मे आया. जिसे पटेल ने गृह मंत्री होने के नाते बखूबी अंजाम दिया. लेकिन भारत को सैकड़ों हिस्सों में तोड़ने वाला मसौदा ब्रिटेन भेजने के पहले माउंटबेटन ने नेहरू को दिखाया.माउंटबेटन के हिसाब से ब्रिटेन को क्राउन की सर्वोच्चता वापस ले लेनी चाहिए. यानी जितने भी राज्यों को समय-समय पर ब्रिटिश क्राउन की सर्वोच्चता स्वीकारनी पड़ी थी, इस व्यवस्था से सब स्वतंत्र हो जाते.नेहरू यह मसौदा देखने के बाद पूरी रात सो नहीं सके. उन्होंने माउंटबेटन के नाम एक सख्त चिट्ठी लिखी. तड़के वो उनसे मिलने पहुंच गए. नेहरू की दृढ इच्छा शक्ति के आगे मजबूरन माउंटबेटन को नया मसौदा बनाना पड़ा जिसे ‘3 जून योजना’ के नाम से जाना जाता है.जिसमें भारत और पाकिस्तान दो राज्य इकाइयों की व्यवस्था दी गई थी. ध्यान रहे सरदार पटेल जिस सरकार में गृह मंत्री थे, नेहरू उसी सरकार के प्रधानमंत्री थे.सरदार पटेल खुद बार-बार नेहरू को अपना नेता घोषित करते रहे थे. अपनी मृत्यु के समय भी उनके दिमाग में दो चीजें चल रही थीं. एक यह कि वो अपने बापू को बचा नहीं सके और दूसरी यह कि सब नेहरू के नेतृत्व को स्वीकार करते हुए आगे बढ़ें. जो लोग सरदार पटेल की विरासत को हड़पकर नेहरू पर निशाना साधते हैं, उन्हें सरदार पटेल और नेहरू के पत्राचार पढ़ लेने चाहिए.नेहरू पर कीचड़ उछालना इसलिए जरूरी है कि नेहरू ने इस देश में लोकतंत्र की जड़ें गहरी जमा दीं. यह किससे छुपा है कि आरएसएस की आस्था लोकतंत्र में लेशमात्र नहीं है. खुद हमारे प्रधानमंत्री ने पद संभालने के बाद कभी कोई प्रेस कांफ्रेंस बुलाना मुनासिब नहीं समझा.ऐसे लोगों के नेहरू से डरते रहना एकदम स्वाभाविक है. क्योंकि नेहरू में अपनी आलोचना खुद करने का साहस था, सुनने की तो कहिये ही मत.नेहरू की लोकतंत्र के प्रति निष्ठा की एक रोचक कहानी है. नेहरू हर तरफ अपनी जय-जयकार सुनकर ऊब चुके थे. उनको लगता था कि बिना मजबूत विपक्ष के लोकतंत्र का कोई मतलब नहीं. इसलिए नवंबर 1957 में नेहरू ने मॉडर्न टाइम्स में अपने ही खिलाफ एक ज़बर्दस्त लेख लिख दिया.चाणक्य के छद्मनाम से ‘द राष्ट्रपति’ नाम के इस लेख में उन्होंने पाठकों को नेहरू के तानाशाही रवैये के खिलाफ चेताते हुए कहा कि नेहरू को इतना मजबूत न होने दो कि वो सीजर हो जाए.मशहूर कार्टूनिस्ट शंकर अपने कार्टूनों में नेहरू की खिल्ली नहीं उड़ाते थे. नेहरू ने उनसे अपील की कि उन्हें हरगिज बख्शा न जाए. फिर शंकर ने नेहरू पर जो तीखे कार्टून बनाये वो बाद में इसी नाम से प्रकाशित हुए- ‘डोंट स्पेयर मी, शंकर’.गांधीजी की हत्या के बाद भी उन्होंने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पर लंबे समय तक प्रतिबंध को नेहरू ने ठीक नहीं माना. उनका मानना था कि आजाद भारत में इन तरीकों का प्रयोग जितना कम किया जाए, उतना अच्छा. नेहरू को इस बात की बड़ी फिक्र रहती थी कि लोहिया जीतकर संसद में जरूर पहुंचे. जबकि लोहिया हर मौके पर नेहरू पर जबरदस्त हमला बोलते रहते थे.बात नेहरू के महिमामंडन की बात नहीं है. नेहरू की असफलताएं भी गिनाई जा सकती हैं. लेकिन उसके पहले आपको नेहरू का इस देश में महान योगदान भी स्वीकारना होगा. 70 सालों में इस देश में कुछ नहीं हुआ के नारे के पीछे असली निशाना नेहरू ही हैं. नेहरू औपनिवेशिक शोषण से खोखले हो चुके देश को फिर से अपने पैरों पर खड़ा करने की कोशिश में लगे थे.सैकड़ों चुनौतियों और सीमाओं के बीच घिरे नेहरू चक्रव्यूह में अभिमन्यु की तरह लड़ रहे थे, जहां अंततः असफलता ही नियति थी. एक बार गोपाल कृष्ण गोखले ने कहा था हमने अपनी असफलताओं से ही सही, देश की सेवा तो की. फिर भी उनकी आंखों में इस देश के सबसे गरीब-सबसे मजलूम को ऊपर उठाने का सपना था.चार घंटे सोकर भी उन्होंने इसका कभी अहसान नहीं जताया और खुली आंखों से भारत को दुनिया के नक्शे पर चमकाने की कसीदाकारी करते रहे. प्रसिद्ध अर्थशास्त्री डेनियल थॉर्नर कहते थे कि आजादी के बाद जितना काम पहले 21 सालों में नेहरू आदि ने किया, उतना तो 200 साल में किए गए काम के बराबर है.मान भी लें कि नेहरू असफल नेता थे, तो भी उनकी नीयत दुरुस्त थी. आपने किसी ऐसे नेता के बारे में सुना है जो दंगाइयों की भीड़ के सामने निडर खड़ा होकर अपना सिर पीट- पीटकर रोने लगे या दंगा रोकने के लिए पुलिस की लाठी छीनकर ख़ुद भीड़ को तितर-बितर करने लगे.या फिर जिसने हर तरह के सांप्रदायिक लोगों की गालियां और धमकियां सुनने के बावजूद हार न मानी हो. या फिर ऐसे नेता का जिसका फोन नंबर आम जनता के पास भी हो. और किसी ऐसे नेता को जानते हैं जो खुद ही फोन भी उठा लेता हो.या फिर जिसने हर तरह के सांप्रदायिक लोगों की गालियां और धमकियां सुनने के बावजूद हार न मानी हो. या फिर ऐसे नेता का जिसका फोन नंबर आम जनता के पास भी हो. और किसी ऐसे नेता को जानते हैं जो खुद ही फोन भी उठा लेता हो.अगर नहीं तो आप नेहरू पर कीचड़ उछालने से बाज आइये और दूसरों को ऐसा करने से रोकिये. यकीन मानिए नेहरू होना इतना आसान नहीं है. अगर आपको नेहरू के नाम की कीमत नहीं पता तो आरएसएस के दुष्प्रचार से दूर किसी अन्य देश चले जाइए. लोग आपकी इज्जत इसलिए भी करेंगे कि आप गांधी के देश से हैं, आप नेहरू के देश से हैं.

मनोज जी के वाल से इप्टा के बारे में

दिल्ली में जार्ज पंचम का दरबार 1911 में लगा था| उस दरबार में हिन्दुस्तान के तमाम राजा, नवाब दरबारी के तौर पर बुलाए गए थे| नामी-गिरामी कलाकार भी आए थे | हालाँकि अंग्रेजों को मुगलों की तहजीब से चिढ़ थी और अपने को खासे आधुनिक मानते थे, उन्नीसवीं सदी के आख़िरी तक उपयोगितावादी सामाजिक-राजनीतिक दर्शन का बोलबाला भी हो चला था, लेकिन ‘दरबारी’ संस्कृति उन्हें काम की लगी| दरबारी संस्कृति को उन्होंने भव्य तरीके से पुनर्जीवित किया|

वर्तमान शासन की संस्कृति में जो औपनिवेशिक ‘साहबी’ है उसका ढाँचा जितना ब्रिटेन में तैयार हुआ उतना ही हिन्दुस्तान में भी| औपनिवेशिक ‘साहबी’ ने काफी हद तक मुगलिया दरबारीपन को आत्मसात कर लिया था|

सत्ताएँ दृश्य रचती हैं| भव्य दृश्य रचकर अपने ‘होने’ को इतिहास के सीमान्त से परे स्थित होने का भ्रम रचती हैं| सत्ता के प्रतिरोध में खड़ी ताकतों के पास दृश्य को पढ़ने की काबलियत होनी चाहिए|

देसी स्वाँग हो या ब्रेख्तियन थियेटर वह इस दृश्य की ‘दृश्यता’ को उघाड़ कर रख देता है| नाटक महज नक़ल की नहीं, अक़्ल की कला है| बल्कि वह अक़्ल के साथ नक़ल की कला है- ‘दिखलाओ कि तुम दिखला रहे हो|’

रंगकर्म अपने मूल चरित्र में ही सौन्दर्यात्मक होने के साथ-साथ नैतिक और राजनैतिक कला है|

अंत में मैला आँचल से विदापत नाच की कुछ पंक्तियाँ:

थारी बेच पटवारी के देलियै
लोटा बेच चौकीदारी|
बाकी थोड़ेक लिखाई जे रहलै
कलक देलक धुराई रे धिरजा|

” आखिर…”

कहे कबीर सुनो भाई साधो
सब दिन करी बेगारी
खँजड़ी बजा के गीत गवैछी
फटकनाथ गिरधारी रे धिरजा|

“ओ-हो-हा-हा, खी-खी-खी ….हा-हा! ….शामियाना फट जाएगा| कमाल कर दिया…” (मैला आँचल- पन्द्रहवाँ अध्याय)

भारतीय जननाट्य संघ (इप्टा) ने आज (25 मई, 2018 को) 75 साल पूरा कर लिया है। उन साथियों को मार्क कर रहा हूँ जिनके साथ इस आन्दोलन में कुछ कदम मैं भी चला था| Firoz Ashraf Khan Yogesh Pandey Ishteyaque Ahmad Rupa Jha Javed Akhtar Khan Vinod Kumar (आगे आपलोग अपनी लिस्ट से बाकी साथियों को मार्क कर दें|)

[कुछ पुराना, कुछ अभी का]