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मंगल पांडे नहीं, तिलका मांझी और सिदो-कान्हू थे पहले स्वतंत्रता संग्रामी

भारत का पहला स्वतंत्रता संग्राम 1857 में मंगल पांडे ने नहीं, 1771 में तिलका मांझी ने शुरु किया था। बाद में 1855 में सिदो-कान्हू ने संताल विद्रोह को आगे बढ़ाया। यह हूल विद्रोह था। लेकिन भारतीय इतिहासकारों ने संतालों के विद्रोह को लिखा ही नहीं। जबकि इसके सारे प्रमाण मौजूद हैं। हूल दिवस के मौके पर संताल विद्रोहियों को याद कर रहे हैं

हूल विद्रोह : तिलका मांझी और सिदो-कान्हू सहित संताल आदिवासियों की शौर्य गाथा


आज संताल हूल दिवस है, यानी अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ विद्रोह दिवस। वैसे तो भारतीय इतिहास में अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ पहला विद्रोह 1857 है, मगर जब हम आदिवासियों के इतिहास को देखते हैं तो पाते हैं यह विद्रोह 1771 में ही तिलका मांझी ने शुरू कर दिया था।

वहीं 30 जून 1855 को संताल आदिवासियों ने सिदो, कान्हू, चांद, भैरव और उनकी बहन फूलो, झानो के नेतृत्व में साहेबगंज जिले के भोगनाडीह में 400 गांव के 40,000 आदिवासियों ने अंग्रेजों को मालगुजारी देने से साफ इंकार कर दिया। इस दैरान सिदो ने कहा था — अब समय आ गया है फिरं‍गियों को खदेड़ने का। इसके लिए “करो या मरो, अंग्रेज़ों हमारी माटी छोड़ो” का नारा दिया गया था। अंग्रेजों ने तुरंत इन चार भाइयों को गिरफ्तार करने का आदेश जारी किया। गिरफ्तार करने आये दारोगा को संताल आंदोलनकारियों ने गर्दन काटकर हत्या कर दी। इसके बाद संताल परगना के सरकारी अधिकारियों में आतंक छा गया।

बताया जाता है जब कभी भी आदिवासी समाज की परंपरा, संस्कृति और उनके जल, जंगल जमीन को विघटित करने का प्रयास किया गया है, प्रतिरोध की चिंगारी भड़क उठी। 30 जून 1855 का हूल इसी कड़ी का एक हिस्सा है। महाजनों, जमींदारों और अंग्रेजी शासन द्वारा जब आदिवासियों की जमीन पर कब्जा करने का प्रयास किया गया तब उनके खिलाफ आदिवासियों का गुस्सा इतना परवान चढ़ा कि इस लड़ाई में सिदो, कान्हू, चांद, भैरव और उनकी बहन फूलो, झानो सहित लगभग 20 हज़ार संतालो ने जल, जंगल, जमीन की हिफाजत के लिए अपनी कुर्बानी दे दी। इसके पूर्व गोड्डा सब-डिवीजन के सुंदर पहाड़ी प्रखंड की बारीखटंगा गांव का बाजला नामक संताल युवक की विद्रोह के आरोप में अंग्रेजी शासन द्वारा हत्या कर दी गई थी। अंग्रेज इतिहासकार विलियम विल्सन हंटर ने अपनी किताब ‘द एनल्स ऑफ रूरल बंगाल’ में लिखा है कि अंग्रेज का कोई भी सिपाही ऐसा नहीं था जो आदिवासियों के बलिदान को लेकर शर्मिंदा न हुआ हो। अपने कुछ विश्वस्त साथियों के विश्वासघात के कारण सिदो और कान्हू को पकड़ लिया गया और भोगनाडीह गांव में सबके सामने एक पेड़ पर टांगकर फांसी दे दी गयी। 20 हज़ार संतालों ने जल, जंगल, जमीन की हिफाजत के लिए अपनी कुर्बानी दे दी थी।

अंग्रेजों ने प्रशासन की पकड़ कमजोर होते देख आंदोलन को कुचलने के लिए सेना को मैदान में उतारा और मार्शल लॉ लगाया गया। हजारों संताल आदिवासियों को गिरफ्तारी किया गया, लाठियां चली, गोलियां चलायी गयी। यह लड़ाई तब तक जारी रही, जब तक अंतिम आंदोलनकारी जिंदा रहा।

इसके पूर्व 1771 से 1784 तक तिलका मांझी उर्फ जबरा पहाड़िया ने ब्रिटिश सत्ता के विरुद्ध लंबी और कभी न समर्पण करने वाली लड़ाई लड़ी और स्थानीय महाजनों-सामंतों व अंग्रेजी शासक की नींद उड़ाए रखा। पहाड़िया लड़ाकों में सरदार रमना अहाड़ी और अमड़ापाड़ा प्रखंड (पाकुड़, संताल परगना) के आमगाछी पहाड़ निवासी करिया पुजहर और सिंगारसी पहाड़ निवासी जबरा पहाड़िया भारत के आदिविद्रोही हैं। दुनिया का पहला आदिविद्रोही रोम के पुरखा आदिवासी लड़ाका स्पार्टाकस को माना जाता है। भारत के औपनिवेशिक युद्धों के इतिहास में जबकि पहला आदिविद्रोही होने का श्रेय पहाड़िया आदिम आदिवासी समुदाय के लड़ाकों को जाता हैं जिन्होंने राजमहल, झारखंड की पहाड़ियों पर ब्रितानी हुकूमत से लोहा लिया। इन पहाड़िया लड़ाकों में सबसे लोकप्रिय आदि विद्रोही जबरा या जौराह पहाड़िया उर्फ तिलका मांझी हैं। इन्होंने 1778 ई. में पहाड़िया सरदारों से मिलकर रामगढ़ कैंप पर कब्जा करने वाले अंग्रेजों को खदेड़ कर कैंप को मुक्त कराया। 1784 में जबरा ने क्लीवलैंड को मार डाला। बाद में आयरकुट के नेतृत्व में जबरा की गुरिल्ला सेना पर जबरदस्त हमला हुआ जिसमें कई लड़ाके मारे गए और जबरा को गिरफ्तार कर लिया गया। कहते हैं उन्हें चार घोड़ों में बांधकर घसीटते हुए भागलपुर लाया गया। पर मीलों घसीटे जाने के बावजूद वह तिलका मांझी जीवित था। बतया जाता है कि खून में डूबी उसकी देह तब भी गुस्सैल थी और उसकी लाल-लाल आंखें ब्रितानी राज को डरा रही थीं। अंग्रेजों ने तब भागलपुर के चौराहे पर स्थित एक विशाल वटवृक्ष पर सरेआम लटका कर उनकी जान ले ली। हजारों की भीड़ के सामने जबरा पहाड़िया उर्फ तिलका मांझी हंसते-हंसते फांसी पर झूल गए। तारीख थी संभवतः 13 जनवरी 1785। बाद में आजादी के हजारों लड़ाकों ने जबरा पहाड़िया का अनुसरण किया और फांसी पर चढ़ते हुए जो गीत गाए – हांसी-हांसी चढ़बो फांसी …! – वह आज भी हमें इस आदिविद्रोही की याद दिलाते हैं।

तिलका मांझी संताल थे या पहाड़िया इसे लेकर विवाद है। आम तौर पर तिलका मांझी को मूर्म गोत्र का बताते हुए अनेक लेखकों ने उन्हें संताल आदिवासी बताया है। परंतु तिलका के संताल होने का कोई ऐतिहासिक दस्तावेज और लिखित प्रमाण मौजूद नहीं है। वहीं, ऐतिहासिक दस्तावेजों के अनुसार संताल आदिवासी समुदाय के लोग 1770 के अकाल के कारण 1790 के बाद संताल परगना की तरफ आए और बसे।

द एनल्स ऑफ रूरल बंगाल’, 1868 के पहले खंड(पृष्ठ संख्या 219-227) में सर विलियम विल्सर हंटन ने साफ लिखा है कि संताल लोग बीरभूम से आज के सिंहभूम की तरफ निवास करते थे। 1790 के अकाल के समय उनका पलायन आज के संताल परगना तक हुआ। हंटर ने लिखा है, ‘1792 से संतालों का नया इतिहास शुरू होता है’ (पृ. 220)। 1838 तक संताल परगना में संतालों के 40 गांवों के बसने की सूचना हंटर देते हैं जिनमें उनकी कुल आबादी 3000 थी (पृ. 223)। हंटर यह भी बताता है कि 1847 तक मि. वार्ड ने 150 गांवों में करीब एक लाख संतालों को बसाया (पृ. 224)।

1910 में प्रकाशित ‘बंगाल डिस्ट्रिक्ट गजेटियर: संताल परगना’, वोल्यूम 13 में एल.एस.एस. ओ मेली ने लिखा है कि जब मि. वार्ड 1827 में दामिने कोह की सीमा का निर्धारण कर रहा था तो उसे संतालों के 3 गांव पतसुंडा में और 27 गांव बरकोप में मिले थे। वार्ड के अनुसार, ‘ये लोग खुद को सांतार कहते हैं जो सिंहभूम और उधर के इलाके के रहने वाले हैं।’ (पृ. 97) दामिनेकोह में संतालों के बसने का प्रामाणिक विवरण बंगाल डिस्ट्रिक्ट गजेटियर: संताल परगना के पृष्ठ 97 से 99 पर उपलब्ध है।

इसके अतिरिक्त आर. कार्सटेयर्स जो 1885 से 1898 तक संताल परगना का डिप्टी कमिश्नर रहा था, उसने अपने उपन्यास ‘हाड़मा का गांव’ की शुरुआत ही पहाड़िया लोगों के इलाके में संतालों के बसने के तथ्य से की है।

बांग्ला की सुप्रसिद्ध लेखिका महाश्वेता देवी ने तिलका मांझी के जीवन और विद्रोह पर बांग्ला भाषा में एक उपन्यास ‘शालगिरर डाके’ की रचना की है। अपने इस उपन्यास में महाश्वेता देवी ने तिलका मांझी को मुर्मू गोत्र का संताल आदिवासी बताया है।

वहीं हिंदी के उपन्यासकार राकेश कुमार सिंह ने अपने उपन्यास ‘हूल पहाड़िया’ में तिलका मांझी को जबरा पहाड़िया के रूप में चित्रित किया है।

बहरहाल, हूल विद्रोह की जो वजहें 19वीं सदी में थीं, उसी तरह की परिस्थितियां आज भी आदिवासी इलाकों में कायम हैं। पूंजीवादी घरानों के लिए आदिवासियों को जल, जंगल और जमीन से वंचित किया जा रहा है। विरोध करने पर उन्हें नक्सली कहकर उनका सरकारी नरसंहार भी जारी है। झारखंड में ही सीएनटी और एसपीटी एक्ट में बदलाव के जरिए आदिवासियों की जमीन को हड़ने की साजिश हो रही है। दिखावे के लिए उड़ता हाथी दिखाया जा रहा है। ऐसे में हूल विद्रोह की प्रासंगिकता और भी बढ़ जाती है

जब टीपू सुल्तान ने शंकराचार्य को लिखा, ‘आप विश्व के गुरु हैं’

जब भी भीड़ के विवेक से परे हटकर टीपू सुल्तान का मूल्यांकन किया जाएगा तब उन्हें अंग्रेजी राज के ख़तरे को पहचानने और उनके ख़िलाफ़ लड़कर शहीद होने वाले शासक की तौर पर याद रखा जाएगा.

अंग्रेजी राज के शुरुआती दिनों से ही टीपू सुल्तान को लेकर एक मिथ के निर्माण की प्रक्रिया शुरू हो गई. बाद के काल में भी यह प्रक्रिया बदस्तूर जारी रही क्योंकि जनमानस में टीपू एक नायक की तरह गहरे तक पैठा हुआ था और लोग उसे अंग्रेजों के खिलाफ लोहा लेने वाला एक वीरसाहसी था और उसे युद्ध की रणनीति बनाने में जबरदस्त महारत हासिल थी. उसने 17 साल की उम्र में अंग्रेजों के खिलाफ अपने पिता हैदर अली की अगुवाई में पहला युद्ध लड़ा था.

द्वितीय आंग्ल-मैसूर युद्ध के दौरान जब हैदर अली की मृत्यु हो गई तो 1782 में टीपू ने मैसूर की गद्दी संभाली. इस युद्ध की समाप्ति पर टीपू ने अंग्रेजों को एक अपमानजनक संधि पर राजी करने को मजबूर किया.

टीपू ने अंग्रेजों से लोहा लेने के लिए अपनी सेनाओं को यूरोपीय ढंग से प्रशिक्षित करवाया और भारत की पहली आधुनिक नौसेना की नींव रखी. टीपू ने अपने समय के धुरंधर सेनापतियों (कार्नवालिस और वेलेजली) की आंखों की नींद उड़ा दी थी.

उसने अंग्रेजों को घेरने के उद्देश्य से फ्रांस से नजदीकियां बढ़ाईं और एक अंतरराष्ट्रीय गठबंधन बनाने के प्रयास भी किए. इस तरह, टीपू अंग्रेजी राज के विरुद्ध लड़ने के लिए भारतीयों का हौसला था. वह ऐसा महानायक था जिसे अंग्रेज फूटी आंख नहीं देखना चाहते थे.

टीपू की इस छवि को विखंडित करने के लिए इतिहास को विकृत करना जरूरी था. चूंकि टीपू धर्म से एक मुस्लिम शासक था, साम्राज्यवादी इतिहासकारों की यह व्याख्या सांप्रदायिक इतिहास लेखन परंपरा में जिंदा रही क्योंकि आरएसएस सरीखे संगठनों ने इसे आगे बढ़ाया.

इसीलिए टीपू को सांप्रदायिक साहित्य में ठीक उसी तरह चित्रित किया गया जैसा अंग्रेजों ने किया था. इसीलिए जब कर्नाटक की कांग्रेस सरकार ने टीपू की जयंती मनाने की घोषणा की-आरएसएस, विश्व हिंदू परिषद् और भाजपा को एक मनचाहा मुद्दा मिल गया.

साम्राज्यवाद के समर्थक इतिहासकारों, यात्रियों और लेखकों ने टीपू के इतिहास के जिस आयाम पर सबसे ज्यादा जोर दिया, वह था-टीपू का हिंदुओं पर जुल्म ढाना. लेकिन इसके उलट अगर हम हिंदुओं और हिंदू धर्म स्थानों के प्रति टीपू की नीति का मूल्यांकन करने के लिए तत्कालीन मैसूर संबंधित प्राथमिक स्रोतों को आधार बनाएं तो तस्वीर एकदम अलग हो जाती है.

मसलन यही टीपू हिंदू मंदिरों, संस्थाओं और तीर्थों के संरक्षक के रूप में सामने आता है. हिंदू मंदिरों को भेटें भेजता है और हिंदू मंदिरों में विभिन्न संप्रदायों के बीच चल रहे विवादों में मध्यस्थ की भूमिका भी निभाता है.

एक बार मैसूर के मेलुकोटे मंदिर में की जाने वाली एक प्रार्थना के पुराने रूप का एक अंश एक संप्रदाय के दबाव में निकाल दिया गया. ऐसा मैसूर के राजा के आदेश से हुआ था और इसे लेकर शुद्धतावादी संप्रदाय में नाराजगी थी.

टीपू ने एक आदेश जारी करते हुए कुप्पया को दोनों समुदायों (वडगले और तेंगले) के साथ न्याय करने की हिदायत दी.

टीपू कई महत्वपूर्ण हिंदू मंदिरों को नियमित भेटें भेजता था और उनके पुजारी वर्ग को आदर के साथ संबोधित करता था. इस बात के कई प्रमाण मौजूद हैं. मैसूर के कम से कम चार बड़े मंदिरों के बारे में तो यह बात पूरे सबूत के साथ कही जा सकती है.

इन मंदिरों में सेरिन्गापट्टनम का रंगनाथ मंदिर, मेलुकोट का नरसिम्हा मंदिर, मेलुकोट का ही नारायणस्वामी मंदिर, कलाले का लक्ष्मीकांत मंदिर और नंजनगुड का श्रीकंतेश्वारा मंदिर उल्लेखनीय हैं.

इन मंदिरों को चांदी के बर्तन आदि भेंटस्वरूप भेजे जाते थे. कहा जा सकता है कि टीपू अपने राज्य में स्थित इन हिंदू धर्मस्थानों के प्रति अपने आदर से उनका विश्वास जीतना चाहता था. बल्कि यह नीति तो टीपू से पहले हैदर अली के समय ही शुरू हो गयी थी और हैदर अली ने मैसूर की जनता के बीच अपनी उदार छवि का निर्माण करने में सफलता हासिल की थी.

टीपू द्वारा प्रख्यात श्रृंगेरी मठ को लिखे गए तकरीबन तीस पत्र इस बात की गवाही हैं कि टीपू को अपने राज्य की धार्मिक विविधता का अंदाजा था और वो सबका यकीन जीतने का हामी था.

एक पत्र में तो टीपू अपने राज्य पर तीन शत्रुओं (हैदराबाद के निजाम, अंग्रेज और मराठों) का हवाला देकर मठ के स्वामी से अनुरोध करता है कि वे राज्य की विजय कामना के साथ शत चंडी और सहस्त्र चंडी यज्ञ करें. जिसके लिए आवश्यक सामग्री का इंतजाम राज्य की देख-रेख में किया गया.

आप जगद्गुरु हैं, विश्व के गुरु. आपने सदैव समस्त विश्व की भलाई के लिए और इसलिए कि लोग सुख से जी सकें कष्ट उठाए हैं. कृपया ईश्वर से हमारी समृद्धि की कामना करें. जिस किसी भी देश में आप जैसी पवित्र आत्माएं निवास करेंगी, अच्छी बारिश और फसल से देश की समृद्धि होगी.आप जगद्गुरु हैं, विश्व के गुरु. आपने सदैव समस्त विश्व की भलाई के लिए और इसलिए कि लोग सुख से जी सकें कष्ट उठाए हैं. कृपया ईश्वर से हमारी समृद्धि की कामना करें. जिस किसी भी देश में आप जैसी पवित्र आत्माएं निवास करेंगी, अच्छी बारिश और फसल से देश की समृद्धि होगी.

यहां एक बात स्पष्ट कर देना जरूरी है. आम मध्यकालीन या पूर्व-आधुनिक शासकों की तरह टीपू को न सिर्फ अपने राज्य की सुरक्षा करनी थी बल्कि उसका विस्तार करना भी उसकी प्राथमिकता था. इसलिए उसने मैसूर के आस-पास के इलाकों पर हमले किए और उनका मैसूर में विलय किया.

हैदर अली ने मालाबार, कोझीकोड, कोडगू, त्रिचूर और कोच्चि को जीत लिया था. अंग्रेजों और मराठों से युद्धों के क्रम में टीपू को कोडगू और कोच्चि पर फिर हमले किए.

इन दोनों इलाकों और मालाबार और कोझीकोड पर नियंत्रण बनाये रखने के क्रम में एक मध्ययुगीन शासक की तरह उसने गांव के गांव जलवा दिए और सामूहिक दंड निश्चित किये. और इसी क्रम में मंदिरों और चर्चों को भी नष्ट किया. लेकिन किसी भी शासक की धार्मिक नीति का मूल्यांकन उसके युद्ध-कार्यों के आधार पर नहीं किया जाता. बल्कि उसकी घरेलू नीति के आधार पर किया जाता है.

यानी कि टीपू का इतिहास दो भिन्न स्रोतों के आधार पर लिखा जा सकता है-औपनिवेशिक स्रोतों के आधार पर और भारतीय स्रोतों के आधार पर. जिन्हें पहली तरह के स्रोत ज्यादा विश्वसनीय लगते हैं या वे उनकी राजनीति के लिए मुफीद हैं, वो टीपू सुल्तान को खलनायक मानने के लिए स्वतंत्र हैं.

जिन्हें इतिहास और इतिहासलेखन की समझ है वो टीपू सुलतान को उसके परिप्रेक्ष्य में रखकर मूल्यांकित करने की कोशिश करेंगे. और, जो लोग ऐसा करेंगे वो टीपू की औपनिवेशिक व्याख्या को अन्य स्रोतों के साथ रखकर जाचेंगे.

(लेखक राष्ट्रीय आंदोलन फ्रंट नामक संगठन के राष्ट्रीय संयोजक हैं.)(लेखक राष्ट्रीय आंदोलन फ्रंट नामक संगठन के राष्ट्रीय संयोजक हैं.)(लेखक राष्ट्रीय आंदोलन फ्रंट नामक संगठ

फ़ैक्ट चेकिंग’ से मुँह चुराकर सिग्नेचर ब्रिज से यमुना में कूदा गोदी मीडिया!

चार नवंबर का दिन दिल्ली के लिए महत्वपूर्ण रहा। मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने यमुना पर बने ’सिग्नेचर ब्रिज’ का लोकार्पण किया। यह दिल्ली के नागरिकों को बड़ी राहत देगा। इसका पर्यटन महत्व भी होगा। आजादी के बाद दिल्ली सरकार की बनाई पहली ऐसी अधिसंरचना के तौर पर देखा जा रहा है।
लेकिन इसके अलावा भी चार नवंबर का खास अर्थ है। देश में लोकतंत्र की खस्ताहालत का भी गवाह बना है चार नवंबर। लोकतंत्र के प्रमुख वाहक राजनीति और मीडिया पर गंभीर सवाल छोड़ गया यह चार नवंबर। साबित हुआ कि राजनीति अगर छलप्रपंच का दूसरा नाम हो तथा मीडिया अगर लालच अथवा भय का शिकार हो, तो सच पर झूठ की काली चादर फैल जाएगी।
‘सिग्नेचर ब्रिज’ का खुलना सभी देशवासियों के लिए खुशी का अवसर था। ऐसी एक भी वजह नहीं, जो इस मौके पर किसी ओछी राजनीति की अनुमति दे। लेकिन देश को मंदिर- मस्जिद की संकीर्ण सोच में धकेल रही भाजपा ने इस शुभ मौके को अपशकुन में बदल दिया।

शुरूआत सांसद मनोज तिवारी ने की, जो प्रदेश भाजपा अध्यक्ष भी हैं। ट्वीट किया- ’कल तीन बजे मैं

ट्वीट किया- ’कल तीन बजे मैं सिग्नेचर ब्रिज पर रहूंगा। सांसद हूं भाई।’
इस ट्वीट में मनोज तिवारी ने कुछ अनावश्यक बातें भी लिखीं, जिसमें ओछी राजनीति की साफ झलक थी।
इस पर डिप्टी सीएम मनीष सिसोदिया ने व्यंग्यपूर्ण ट्वीट किया& ’कल पूरी दिल्ली आमंत्रित है। आप भी सादर आमंत्रित हैं। उम्मीद है कल आप आएंगे और इस महान अवसर की गरिमा भी बनाए रखेंगे।’
जाहिर है कि यह व्यंग्य था। किसी सांसद को ’गरिमा’ बनाए रखने की हिदायत देना कोई ’आमंत्रण’ नहीं था। इसके बावजूद सांसद मनोज तिवारी पहुंचे। खुद मनोज तिवारी का दावा है कि वह 1200 लोगों के साथ पहुंचे। लोकार्पण का समय चार बजे का दिया गया था। लेकिन वह तीन बजे ही पहुंच गए। मंच पर चढ़ने का प्रयास किया। अपने 1200 लोगों के साथ मंच के आसपास के इलाके पर कब्जा कर लिया।
कई वीडियो आए हैं जिनमें मनोज तिवारी के साथ आए लोग पोस्टर बैनर फाड़ रहे हैं, जयश्री राम के नारे लगा रहे हैं, मोदी&मोदी के नारे लगा रहे हैं। मनोज तिवारी शेर है जैसे नारे भी लगे। रोकने की कोशिश पर पुलिस से झड़प भी हुई। एक तसवीर में मनोज तिवारी ने डीसीपी अतुल ठाकुर का कॉलर पकड़ रखा है। एक वीडियो में आप विधायक अमानतुल्लाह द्वारा मनोज तिवारी को मंच से धकेलने का दृश्य भी है।
इस पर दोनों तरफ से आरोप- प्रत्यारोप ने इस सुखद अवसर को दुखद प्रसंग में बदल दिया।
मीडिया स्वतंत्र और निष्पक्ष होता, तो इस सच को सामने लाने की कोशिश करता। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। प्रिंट और टीवी मीडिया ने इसे लोकार्पण के मौके पर हंगामे की खबर बताकर कर्तव्य की इतिश्री कर ली। यहां तक कि मीडिया के एक हिस्से ने ’सिग्नेचर ब्रिज’ के लोकार्पण से बड़ी खबर मनोज तिवारी को बनाया। इस मौके पर अरविंद केजरीवाल के वक्तव्य को दिखाना बताना भी जरूरी नहीं समझा गया।
ऐसे में अरविंद केजरीवाल ने कई ट्वीट करके कुछ प्रमुख मीडिया संस्थानों का नाम लेकर सवाल किया। पूछा कि क्या मीडिया पर मोदी का प्रभाव इतना गहरा छाया हुआ है। जाहिर है कि गोदी मीडिया के इस दौर में ऐसे सवालों का जवाब न देने की बेशर्मी स्वाभाविक हो चुकी है।
मीडिया स्वतंत्र और निष्पक्ष होता, तो बताता कि किसी भी आयोजन में जाकर हंगामा करने का अधिकार किसी को नहीं है। खासतौर पर किसी संवैधानिक पदधारी को ऐसे किसी आयोजन में नहीं जाना चाहिए, जहां वह विशेष आमंत्रित न हो। एक राज्य सरकार के महत्वपूर्ण समारोह के मंच को जाकर घेर लेना, नारेबाजी करना और हंगामा खड़ा करना पूर्णतया अनुचित है।
मीडिया स्वतंत्र और निष्पक्ष होता, तो मनोज तिवारी को मंच से धकेले जाने की खबर के साथ यह भी बताता कि अनधिकृत तौर पर किसी मंच पर जाना ही अशोभनीय है। जिस मंच पर मुख्यमंत्री और मंत्रिमंडल के सदस्यगण मौजूद हों, वहां अराजकता और असुरक्षा की स्थिति पैदा करना अनुचित है। यह बताना भी मीडिया का धर्म बनता है, जिसे पूरा करने में वह असफल रहा।
दिल्ली में मनोज तिवारी इतना कुछ सिर्फ इस वजह से कर सके कि दिल्ली सरकार के नियंत्रण में पुलिस नहीं है। ऐसी कोई हरकत बंगाल, पंजाब या केरल जैसे गैर-भाजपा राज्य में संभव नहीं, क्योंकि वहीं पुलिस पर राज्य सरकार का नियंत्रण है। तो क्या दिल्ली पुलिस पर केंद्र सरकार के नियंत्रण का ऐसा बेजा इस्तेमाल करके एक चुनी हुई सरकार के कामकाज को बाधित करना लोकतंत्र के हित में है। मीडिया स्वतंत्र और निष्पक्ष होता, तो पूछता। मीडिया यह भी पूछता कि समारोह में जाकर हंगामा करने, पुलिस अधिकारी के साथ हाथापाई करने के दाषियों पर कार्रवाई क्यों नहीं हुई?
खर्च राशि पर भी मीडिया की चुप्पी शर्मनाक :
अब एक दूसरा पहलू देखें। सिग्नेचर ब्रिज बनाने में आए खर्च को लेकर मनोज तिवारी तथा भाजपा के कई नेताओं ने सवाल खड़े किए। मनीष सिसोदिया ने अपने संबोधन में विस्तार से जवाब भी दिया। मीडिया के लिए यह जरूरी विषय बनता है कि इस पर तथ्यों की जांच करके देश को सच बताए।
मनोज तिवारी ने अपने ट्वीट में लिखा था- ’265 करोड़ बजट के ब्रिज को 1500 करोड़ में पूरा किया, जांच हो।’
यह बड़ा आरोप है। जांच होनी चाहिए। सरकार चाहे जो करे, मीडिया को इस पर बात करनी चाहिए थी। नहीं की। दिलचस्प बात यह है कि दिल्ली भाजपा के ही दूसरे बड़े नेता विजय गोयल ने ट्वीट किया- ’लागत 1100 करोड़ थी लेकिन 1518 करोड़ लगे।’
जिस बुनियादी लागत को मनोज तिवारी ने मात्र 265 करोड़ लिखा, उसी को विजय गोयल ने 1100 करोड़ बताया। दोनों में किसने गुमराह किया?

मीडिया स्वतंत्र और निष्पक्ष होता, तो इसके विवरण में आता।
इस पुल के व्यय का पूरा विवरण मनीष सिसोदिया ने दिया। 2004 में इसका प्राक्कलन 459 करोड़ था। लेकिन वह एक सामान्य पुल का बजट था। उसका कोई काम नहीं हुआ। बाद में 2010 में मौजूदा डिजाइन वाले पुल के लिए नया बजट 1131 करोड़ का बना। इसके बाद नीचे की चट्टान की कुछ जटिलता के कारण अतिरिक्त 350 करोड़ का बजट बना। इस तरह फाइलों में इस पुल का काम चलता रहा। लेकिन 2015 में आम आदमी पार्टी की सरकार बनने के बाद इसका जमीनी काम शुरू हुआ और पहला खंभा लगा।
दिल्ली सरकार के बताए इन तथ्यों के अनुसार पुल बनाने में आई लगभग 1500 करोड़ की लागत का वर्ष 2012 के प्राक्कलन पर आधारित है। ऐसे में पुल के व्यय को लेकर मनोज तिवारी द्वारा प्रस्तुत तथ्यों में कितनी सच्चाई है, इसकी जांच करना मीडिया का धर्म था।
एक और दिलचस्प बात। मनोज तिवारी ने एक रिट्वीट में दावा किया है कि उन्होंने इस पुल के निर्माण में 33 करोड़ की राशि खर्च की। क्या इस तथ्य की जांच इतनी मुश्किल है? आम आदमी पार्टी के अनुसार यह सराकर गप्प है। वैसे भी एक सांसद को साल भर में मात्र पांच करोड़ रूपये का फंड मिलता है। मनोज तिवारी को तो मात्र चार साल हुए हैं। अगर उन्होंने अपना पूरा कोष इस पुल के लिए दिया होता, तब भी यह बीस करोड़ ही होता। ऐसे में यह 33 करोड़ की बात कहां से आई? मीडिया स्वतंत्र और निष्पक्ष होता, तो मनोज तिवारी से पूछता। तथ्य पाए जाते, तो पलटकर दिल्ली सरकार से सवाल करता।
मीडिया की यह दुर्दशा लोकतंत्र पर बड़ा संकट है। इस चौथे स्तंभ को प्रहरी की भूमिका मिली है। इसका मतलब यही है कि सार्वजनिक जीवन की तमाम घटनाओं, परिघटनाओं पर मीडिया ऐसी पैनी नजर रखेगा, जिसमें कोई भी पक्ष किसी भी प्रकार को अनुचित आचरण करने और अनर्गल बात करने से डरेगा। मीडिया ने अपनी भमिका से पीछे हटकर उस डर को खत्म कर दिया। इससे एक अराजक लोकतंत्र का निर्माण हो रहा है। सच पर झूठ की गहरी चादर बिछती जा रही है।

पुनश्च : देश का असल संकट वर्तमान कारपोरेट केंद्रित राजनीति है जिसे लोकतंत्र की परवाह नहीं। मीडिया का मौजूदा संकट इसी की उपज है। इस आलेख में मीडिया से जिस भूमिका की अपेक्षा की गई है, वह एक बेहतर लोकतंत्र में ही संभव है। केंद्रीय सत्ता का दुरूपयोग करके एक लोकतांत्रिक सरकार को परेशान करने की यह परिघटना भारतीय लोकतंत्र की असलियत का प्रतिबिंब है। मीडिया पर केंद्रित इस आलेख को उलटकर लोकंतत्र के संकट के तौर पर खुद ही देखने की कोशिश करें। एक राज्य सरकार अपनी किसी उपलब्धि का उत्सव तक मनाने को स्वतंत्र नहीं।

वरिष्ठ पत्रकार विष्णु राजगढ़िया राँची में रहते हैं।

वरिष्ठ पत्रकार विष्णु राजगढ़िया राँची में रहते हैं।

नज़रिया: ‘आरक्षित सीटों से आने वाले नेता निकम्मे साबित हुए हैं’

संसद और विधानसभाओं में आरक्षित सीटों की वजह से चुनकर आने वाले लगभग बारह सौ जनप्रतिनिधियों ने अपने समुदाय को लगातार निराश किया है. दलित और आदिवासी हितों के सवाल उठाने में ये जनप्रतिनिधि बेहद निकम्मे साबित हुए हैं.

लेकिन इसमें उनकी कोई ग़लती नहीं है उनका ऐसा करना एक संरचनात्मक मजबूरी है क्योंकि उनका चुना जाना उनके अपने समुदाय के वोटों पर निर्भर ही नहीं है.

मिसाल के तौर पर जिग्नेश मेवानी वडगाम सीट पर 15 प्रतिशत दलित वोटर की वजह से नहीं, 85 प्रतिशत ग़ैर-दलित वोटरों के समर्थन से चुने गए हैं. उस सीट के सारे दलित मिलकर भी कभी किसी को जिता नहीं सकते.

सुरक्षित सीटों पर कोई भी ऐसा जनप्रतिनिधि चुनकर नहीं आ सकता, जो दलित या आदिवासी हितों के लिए आक्रामक तरीके से संघर्ष करता हो, और ऐसा करने के क्रम में अन्य समुदायों को नाराज़ करता हो. रिज़र्व सीटें हमेशा दुर्बल जनप्रतिनिधि ही पैदा कर सकती हैं.

संसद और विधानसभा में सीटों के रिज़र्वेशन की व्यवस्था पर सवाल उठाने का समय आ गया है. बेहतर होगा कि ये सवाल ख़ुद अनुसूचित जाति और जनजाति के अंदर से आएं. इस सवाल पर राष्ट्रीय बहस होनी चाहिए.

समुदाय के लिए करते क्या हैं?

2009 में भारतीय संसद ने हर दस साल पर होने वाली एक औपचारिकता फिर निभाई. वही औपचारिकता, अगर कोई ग़ज़ब न हुआ तो, 2019 में फिर निभाई जाएगी.

हर दस साल पर, संसद एक संविधान संशोधन विधेयक पारित करती है, जिसके तहत लोकसभा और विधानसभाओं में अनुसुचित जाति और जनजाति के लिए आरक्षण को दस साल के लिए बढ़ा दिया जाता है और फिर राष्ट्रपति इस विधेयक को अनुमोदित करते हैं. संविधान का अनुच्छेद 334, हर दस साल पर दस और साल जुड़कर बदल जाता है.

इसी प्रावधान की वजह से लोकसभा की 543 में से 79 सीटें अनुसूचित जाति और 41 सीटें अनुसूचित जनजाति के लिए रिज़र्व हो जाती हैं. वहीं, विधानसभाओं की 3,961 सीटों में से 543 सीटें अनुसूचित जाति और 527 सीटें जनजाति के लिए सुरक्षित हो जाती हैं. इन सीटों पर वोट तो सभी डालते हैं, लेकिन कैंडिडेट सिर्फ एससी या एसटी का होता है.

लोकसभा और विधानसभाओं में आज़ादी के समय से ही अनुसूचित जाति और जनजाति का उनकी आबादी के अनुपात में प्रतिनिधित्व रहा है.

सवाल यह उठता है कि इतने सारे दलित और आदिवासी सांसद और विधायक अपने समुदाय के लिए करते क्या हैं?

नेशनल क्राइम रेकॉर्ड्स ब्यूरो के इस साल जारी आंकड़ों के मुताबिक इन समुदायों के उत्पीड़न के साल में 40,000 से ज़्यादा मुकदमे दर्ज हुए. यह आंकड़ा साल दर साल बढ़ रहा है. जाहिर है कि इन आंकड़ों के पीछे एक और आंकड़ा उन मामलों का होगा, जो कभी दर्ज ही नहीं होते हैं.

कई गुना अधिक असर होगा

क्या दलित उत्पीड़न की इन घटनाओं के ख़िलाफ़ दलित सांसदों या विधायकों ने कोई बड़ा, याद रहने वाला आंदोलन किया है? ऐसे सवालों पर, संसद कितने बार ठप की गई है और ऐसा रिज़र्व कैटेगरी के सांसदों ने कितनी बार किया है?

हमने देखा है कि तेलंगाना से आने वाले दसेक सांसदों ने कई हफ़्ते तक संसद की गतिविधियों को बाधित रखा. कोई वजह नहीं है कि लगभग सवा सौ एससी और एसटी सांसद अगर चाह लें तो संसद में इससे कई गुना ज़्यादा असर पैदा कर सकते हैं. लेकिन भारतीय संसद के इतिहास में ऐसा कभी हुआ नहीं है.

इसी तरह, सरकारी नौकरियों और शिक्षा में अनुसूचित जाति और जनजाति को आबादी के अनुपात में आरक्षण मिला हुआ है लेकिन केंद्र और राज्य सरकारें अक्सर यह सूचना देती हैं कि इन जगहों पर कोटा पूरा नहीं हो रहा है. ख़ासतौर पर उच्च पदों पर, अनुसूचित जाति और जनजाति के कोटे का हाल बेहद बुरा है. जैसे कि हम देख सकते हैं कि देश की 43 सेंट्रल यूनिवर्सिटी में एक भी वाइस चांसलर अनुसूचित जाति का नहीं है या कि केंद्र सरकार में सेक्रेटरी स्तर के पदों पर अक्सर एससी या एसटी का कोई अफसर नहीं होता.

शासन के उच्च स्तरों पर अनुसूचित जाति और जनजाति की अनुपस्थिति क्या अनुसूचित जाति और जनजाति के सांसदों के लिए चिंता का विषय है? अगर वे इसके लिए चिंतित हैं, तो उन्होंने सरकार पर कितना दबाव बनाया है? क्या इस सवाल पर कभी संसद के अंदर कोई बड़ा आंदोलन या हंगामा हुआ? ज़ाहिर है कि ऐसा कुछ नहीं हुआ.

चूंकि सरकारी नौकरियों की संख्या लगातार घट रही है और हाल के वर्षों में निजी क्षेत्र में आरक्षण की मांग उठी है, लेकिन क्या अनुसूचित जाति और जनजाति के सांसदों और विधायकों के लिए यह कोई मुद्दा है?

इसी तरह की एक मांग उच्च न्यायपालिका में आरक्षण की भी है. ख़ासकर संसद की कड़िया मुंडा कमेटी की रिपोर्ट में न्यायपालिका में सवर्ण वर्चस्व की बात आने के बाद से यह मांग मज़बूत हुई है. लेकिन क्या अनुसूचित जाति और जनजाति के सांसदों ने कभी इस मुद्दे पर संसद में पुरज़ोर तरीक़े से मांग उठाई है?

120 से ज़्यादा एससी और एसटी सांसदों के लिए किसी मुद्दे पर संसद में हंगामा करना और दबाव पैदा करना मुश्किल नहीं है. इन सांसदों का एक ग्रुप भी है और जो अक्सर मिलते भी हैं लेकिन देश ने कभी इन सांसदों को अपने समुदायों के ज़रूरी मुद्दों पर आंदोलन छेड़ते नहीं देखा है.

इलाहाबाद का इतिहास

इलाहाबादी कवि बोधिसत्व ऐतिहासिक, पौराणिक, सांस्कृतिक प्रमाणों के आधार पर बार-बार बता रहे हैं कि प्रयाग नाम का ऐसा कोई प्राचीन नगर नहीं था, जिसका नाम अकबर ने बदला। अकबर ने संगम पर एक एक किला और दो बाँध बनाकर एक नए नगर की नींव डाली थी जिसे पहले इलावास और बाद में इलाहाबाद कहा जाने लगा। बहरहाल, बहस जारी है। इस सिलसिले में मीडिया विजिल में छप रहे अपने पाँचवें लेख में बोधिसत्व ने सवाल उठाया है कि इलाहाबाद जैसी सांस्कृतिक नगरी की सांस्कृतिक परंपरा का उद्भव कब हुआ। अगर यह नगर पहले से था तो कबीर या तुलसी के समकालीन किसी कवि या लेखक का नाम क्यों नहीं मिलता जो प्रयाग में निवास करता रहा हो।

इलाहाबाद के संदर्भ में लिखते हुए नेहरू जी ने कहा है कि किसी भी नगर का इतिहास उस नगर की इमारतो से नहीं बल्कि उस नगर के निवासियों से बनता है। अब अगर हम नेहरू जी की बात को इलाहाबाद के ऊपर लागू करके देखें तो हमें वर्तमान इलाहाबाद क्षेत्र से कोई भी ऐतिहासिक व्यक्ति अकबर के पूर्व का कोई व्यक्ति इस शहर से नहीं मिलता।

क्या प्रयाग उर्फ इलाहाबाद की सांस्कृतिक परम्परा प्राचीन या मध्ययुग में थी ही नहीं?

या अकबर ने नाम बदलने के साथ ही रात की रात में पूरी सांस्कृतिक परम्परा साहित्य को मिटा दिया। जैसे सरस्वती नदी नहीं मिलती वैसे ही प्रयाग की सांस्कृतिक धारा भी लुप्त हो गई। कोई तानाशाह या शासक नगर उजाड़ सकता है। साहित्य की और संस्कृतिक की धारा नहीं मिटा सकता। ऐसा कोई एक प्रमाण संसार में नहीं मिलता जिसमें नगरों का ध्वंस हुआ हो तो साथ में उसके साहित्य और सास्कृतिक सूत्र भी ध्वस्त कर दिये गए हों।

मेरा प्रश्न है कि जब काशी में संत कबीर थे तब उनका समकालीन या आगे पीछे का संत कवि प्रयाग में कौन था। भक्ति आंदोलन इलाहाबाद में शून्य रहा हो ऐसा तो नहीं। क्योंकि कबीर के गुरु रामानंद का भी जन्म प्रयाग में हुआ है। लेकिन प्रयाग में कहाँ पैदा हुए रामानंद इसका कोई सही उत्तर नहीं मिलता। प्रयाग के किस मोहल्ले किस ग्राम किस क्षेत्र में उन महान रामानंद का कुल-घर था। इसका कोई उत्तर नहीं मिलता।

मैं आपसे कहता हूँ कि प्रयाग के किसी प्राचीनतम कवि का नाम लें। कालिदास का कोई समकालीन संस्कृत कवि प्रयाग का क्यों नहीं मिलता। क्योंकि तब प्रयाग नगर न था। तब प्रतिष्ठानपुरी यानी आज की झूँसी था आवासीय नगर। वही इलावास था । मनु पुत्री इला का नगर या पुरुरवा ऐल की माँ का इला का आवास। कालिदास भी तो अपने विक्रम उर्वशी को प्रयाग नहीं प्रतिष्ठान यानी आज की झूँसी में अवस्थित बताते हैं। वह इंद्र को पराजित करने वाला महान पुरुरवा प्रतिष्ठान का सम्राट है। प्रयाग का नहीं। क्या कालिदास “प्रयाग-द्रोही” थे और “बादशाह अकबर” से मिल गए थे।

हर नगर और जनपद की एक सासंकृतिक परम्परा होती है। खोजने पर उस परम्परा के सूत्र मिलते हैं। उसकी पूरी धारा मिलती है। मैं प्रयाग नगर की सांस्कृतिक धारा की परम्परा पर प्रश्न कर रहा हूँ। मुझे वर्तमान इलाहाबाद शहर के पूर्व में प्रयाग होने की दुहाई देने वाले बताएँ कि क्या है प्रयाग नगर की सांस्कृतिक परम्परा। कौन हैं उसके सांस्कृतिक नेता। क्या है अकबर पूर्व उसकी साहित्यिक राजनौतिक विरासत। प्रयाग तीर्थ की धारा मिलती है। लेकिन नगर की सांस्कृतिक धारा नहीं मिलती। ऐसा क्यों है।

ऐसा इसलिए है क्योंकि प्रयाग मात्र तीर्थ था। तीर्थ जो पार उतारे। भवसागर या भूभाग कहीं भी दूसरी दिशा में जाने का मार्ग दे। प्रयाग से ही पार होकर आगे जा सकते थे राम। मैं रामायण से प्रयाग के वन होने की बात अपने पिछले एक प्रलेख में कर चुका हूँ। रामायण स्वयं प्रयाग को “प्रयाग-वन” कहता है। भरत के अतिथि सत्कार के प्रश्न पर भरत भारद्वाज मुनि से कहते हैं कि “वन में जो कुछ उपलब्ध हो सकता है उसके अनुसार आपने आतिथ्य सत्कार किया है”। यानी प्रयाग वन ही था नगर नहीं। (देखें बाल्मीकि रामायण का अयोध्या कांड अध्याय नब्बे। पहला–तीसरा श्लोक।)

रामायण के बाद महाभारत से प्रयाग की सांस्कृतिक ऐतिहासिक परम्परा के सूत्र खोजते हैं। जब पाण्डव वनवास के लिए निकले थे तो वे अरैल आए थे। महाभारत में अरैल का नाम अलर्कपुर है। वह अरैल भी आज के नगर वाले भाग से अलग गंगापार है। लाक्षागृह और वार्णावत आज भी हैं। जो कि लच्छागीर और बरौत के नाम से स्थानीय रूप से जाने जाते हैं। हंडिया तब हिडिम्बवन था। आज का अरैल किसी प्राचीन सम्राट अलर्क द्वारा स्थापित अलर्कपुर था कभी।

हम इलाहाबाद यानी प्रयाग की सांस्कृतिक परम्परा के संवाहक व्यक्तियों की बात कर रहे थे। अमरकोष नामक महान शब्दकोष के रचनाकार अमर सिंह प्रयाग के मूल निवासी हैं। लेकिन वे नैनी के हैं। यानी जमुनापार वाले क्षेत्र के। आज वाले प्रयाग के नहीं। अगला ऐतिहासिक संदर्भ लेते हैं। कुमारिल भट्ट से शंकराचार्य की मुलाकात प्रयाग में होती है। बड़ा ही त्रासद समय था। कुमारिल का आधा शरीर तुषानल यानी भूसे की आग में जल चुका था। शंकर उनको पराजित करने के उद्देश्य से प्रयाग आए थे। लेकिन प्रयाग में कहाँ हुई उन दोनों ऐतिहासिक महापुरुषों की भेट। कहाँ का उत्तर मिलता है जमुनापार नैनी में। यानी प्रयाग जो कि आज का इलाहाबाद का बदला हुआ नाम बताया जा रहा है। वह भूभाग किसी के मिलन, समागम संग्राम या वाद विवाद का स्थल वह हिस्सा क्यों नहीं मिलता जहाँ आज शहर बसा है। ऐसा इसलिए है कि क्योंकि अकबर पूर्व यहाँ नगर की सम्भावना कल्पित ही नहीं थी। लगभग सारा भूभाग जलमग्न था।

जब कबीर बनारस में सक्रिय थे तो उनके नजदीक का कोई कवि तो प्रयाग में मिलता नहीं। हाँ 1574 ईसवी के आसपास संत कवि बाबा मलूकदास कड़ा मानिकपुर में मिलते हैं। सन 1574 में उनका जन्म माना जाता है। अकबर द्वारा इलाहाबाद की नींव डालने के आसपास उनका जन्म हुआ । मलूक उसी कड़ा मानिकपुर के हैं जो तब के प्रयागक्षेत्र का शासकीय केन्द्र था। जहाँ अलाउद्दीन खिलजी ने अपने चाचा जलालुद्दीन खिलजी का अंत किया। वही मलूकदास जिनका एक दोहा आज भी आलसी जीवों का जीवन सूत्र है-

अजगर करै न चाकरी पंछी करे न काम

दास मलूका कह गए सबके दाता राम।।

मुनि भरद्वाज के बाद प्रयाग का कोई संस्कृत कवि या विद्वान जिनका नाम मिलता है वे हैं अमरकोष वाले अमर सिंह। वे भी नैनी के हैं। भारद्वाज और अमर सिंह के बीच में या बाद में फिर क्रम आता है कुमारिल भट्ट का। अमर सिंह 624 ईसवी के आपपास प्रयाग के नैनी में थे। उस प्रयाग में नहीं जो कि आज का इलाहाबाद है। कुमारिल भट्ट का काल अनुमान से 650 ईसवी माना जाता है। कुमारिल भी नैनी क्षेत्र में अपना अंत किया। उन्होंने मोक्ष पाने के लिए भी प्रयाग वाले अक्षयवट की शरण न ली।

कुमारिल के बाद अगले संस्कृत विद्वान का नाम आता है भानुदत्त मिश्र का। भानुदत्त के आश्रयदाता थे अरैल कड़ा के शासक वीरभानु। तो भानुदत्त मिश्र भी अरैल-कड़ा में आश्रय पाते थे। आधुनिक प्रयाग में नहीं। भानुदत्त के बाद प्रयाग के संस्कृत विद्वानों के क्रम में नाम आता है कबीर, सेन, धन्ना, नाभादास आदि के गुरु रामानंद का। लेकिन ऐसी मान्यता है कि ये कौशम्बी के किसी कान्यकुब्ज कुल में उत्पन्न हुए थे। और इनका भी उस प्रयाग के भूभाग से कोई सीधा संबंध नहीं निकलता जिसके लिए कहा जा रहा कि अकबर ने प्रयाग से इलाहाबाद कर दिया।

क्योंकि प्रयाग वन था और अकबर के द्वारा बांध बनाए जाने के पहले वहाँ नगरीय आबादी की संभावना नहीं थी। आस्था को न इतिहास का आधार चाहिये न तर्क का। वह तो मनोगत होती है। इसिलिए प्रयाग की कोई नगरीय परम्परा नहीं मिलने पर भी लोग प्रयाग को प्राचीन नगर माने पड़े हैं। क्या प्रयाग का कोई कुल या खानदान या घराना मिलता है?

प्रयाग की पाण्डित्य और संगीत परम्परा में कोई भी कवि लेखक कलाकार विद्वान उस भूभाग में उपस्थित या जन्म लेता सृजन करता और मरता भी नहीं दिखता जो आज इलाहाबाद के रूप में उपस्थित है।

मलूकदास के बाद दो कवियों का नाम मध्यकाल की कविता में प्रयाग के कवियों में उल्लेख मिलता है। वे हैं जंगनामा के कवि श्रीधर और दूसरे तोषकवि। तोषकवि सिंगरौर या श्रृंगवेरपुर के थे। और जंगनामा वाले श्रीधर भी प्रयाग नगर के निवासी न थे। आगे जिस सबसे प्राचीन कवि के प्रयाग का होने का प्रमाण मिलता है वे हैं सदासुखलाल जिन्होंने भाषा में सुखसागर का सृजन किया। सुखसागर श्रीमद्भागवत् पुनर्सृजन था। सदासुखलाल जी इलाहाबाद में 1811 में मिर्जापुर से रिटायर होकर आए और 1824 में इनका देहांत हो गया। आगे लाला सीताराम भूप और श्रीधरपाठक से आधुनिक प्रयाग के साहित्य की परम्परा मिलने लगती है।

अब एक और बात और तर्क के लिए पेश की जा सकती है कि प्रयाग की कोई अपनी सांस्कृतिक परम्परा ही न रही हो। नगर में केवल व्यवसायी रहते हों सिपाही रहते हों और संतजन अपने अखाड़े चलाते रहे हों। बस दिन रात भजन होता रहा हो और प्रभु स्मरण में सब के सब दिन बिताते रहते हों। भला ऐसा कोई मुर्दों का टीला हमारा प्रयाग कभी रहा होगा। अगर वो रहा होगा। यह बात कुछ हजम न हुई। भला किसी शहर का कोई सांस्कृतिक इतिहास उसकी स्थापना के पहले संभव है। इसीलिए इलाहाबाद या प्रयाग की कोई सांस्कृतिक धारा अकबर के पहले संभव नहीं दिखती। क्या कवियों लेखकों ने सोच समझ कर नगर प्रयाग में जन्म ही न लिया हो। उन्होंने तय किया हो कि जब तक अकबर बांध न बना दे। जब तक किला न बन जाए हम इलाहाबाद में जन्म ही न लेंगें!

इलाहाबाद के भूगोल पर एक दो बातें आज फिर रख देना चाहता हूँ। इलाहाबाद का ऐतिहासिक अध्ययन प्रो. जी.आर. शर्मा जी ने अपन

े ग्रंथ ‘इलाहाबाद

थ्रू दि एजेज’ में किया है। उनकी किताब का संदर्भ मुझे प्रयाग की पाण्डित्य परम्परा नामक किताब में मिला। जिसकी लेखिका हैं डॉ. उर्मिला श्रीवास्तव जी हैं। यह किताब तथ्यपूर्ण है और पठनीय भी है। प्रो. जी.आर. शर्मा इलाहाबाद यूनिवर्सिटी के एक प्रकांड पंडित थे और उनकी इतिहास दृष्टि प्रांजल थी। अपनी किताब में वे बताते हैं कि “गंगा तट पर बक्शी बांध के पूर्व गंगा की एक धारा फाफामऊ से होकर आज के चांदपुर सलोरी डहररिया, बघाड़ा, चर्चलेन, कमलानेहरू अस्पताल, आनंद भवन, भारद्वाज आश्रम होते हुए लाउदर रोड से वर्तमान मिंटो पार्क के निकट यमुना में विलीन होती थी। गंगा नदी की दूसरी धारा का प्रवाह फाफामऊ से झूँसी की ओर था।”

प्रोफेसर जी.आर. शर्मा कोई साधारण इतिहासकार न थे। उनकी किताब का हवाला आज भी देखा जा सकता है। प्रो. शर्मा के अनुसार “आज के अल्लापुर, टैगोरटाउन, अलोपीबाग, तुलारामबाग, जार्जटाउन, बैरहना आदि जलमग्न यानी डूब के क्षेत्र थे। दारागंज और किले का क्षेत्र एक द्वीप की तरह तब भी रहे होंगे।

यानी कुल मिलाकर आज का जो इलाहाबाद या इलाहाबास या इलावास है वह अकबर के पहले किसी भी स्थिति में संभव नहीं है। कोई इसका नाम बदले या इसको धरातल से रसातल में भेज दे। इलाहाबाद का संस्थापक तो अल् फतह जलालुद्दीन मुहम्मद अकबर वल्द नासिरुद्दीन मुहम्मद हुमायूँ ही था है और माना जाता रहेगा। आप वर्तमान को तोड़ सकते हैं। लेकिन अतीत और भविष्य दोनों का निर्माण आपके हाथों में आना असंभव है।

करवाचौथ : लिंग समानता के दौर में, लिंगभेद का उत्सव!

पतियों की उम्र का ‘लाइसेंस रिन्यू’ करने की तारीख आज फिर से आ गई. पिछले एक हफ्ते से पूरा उत्तर भारत करवाचौथ के ‘पर्व’ की तैयारियों में जुटा था. बाहर बाजार में करवाचौथ की रौनक दिख रही थी, तो घर में टीवी पर. बीते कुछ सालों में, बाजार के इसी अति उत्साह का नतीजा है कि छोटा-बड़ा, अमीर-गरीब सब जानने लगा है कि करवाचौथ का व्रत पत्नियां अपने पतियों की लंबी उम्र के लिए करती हैं. बाजार की बढ़ती महिमा के कारण आजकल पत्नियां इस दिन पतियों से कोई न कोई तोहफा भी जरूर पाने लगी हैं.

करवाचौथ से जुड़ी ये बातें और बाजार का प्रचार कुछ ऐसा संदेश देता है कि यह स्त्रियों का ही त्योहार है. लेकिन क्या सच में ऐसा है? इस त्योहार का एक सामान्य-सा विश्लेषण तो यह नहीं बताता. बल्कि ध्यान से देखें तो पता चलता है कि मामला उल्टा है.

करवाचौथ या ऐसे तमाम व्रतों के नाम स्त्रियों का खून खौलना चाहिए. उनके मन में अशांति और क्रोध बढ़ना चाहिए क्योंकि यह व्रत पुरुष को स्त्री से श्रेष्ठ, ज्यादा कीमती और ज्यादा जरूरी ठहराता है

शुद्ध संस्कृति प्रेमी करवाचौथ को इस तरह भी परिभाषित कर सकते हैं या करते हैं, कि यह कितनी स्वस्थ और अनोखी परंपरा है जहां पत्नी अपने जीवनसाथी की लंबी उम्र के लिए व्रत करती है. लेकिन वे इस परंपरा का बस एक ही पक्ष देखते हैं. यह परंपरा ठीक उसी समय अस्वस्थ और भेदभाव से भरी हो जाती है जब स्त्री, पुरुष की लंबी उम्र और अच्छे स्वास्थ्य के लिए व्रत करती है. ऐसे ही व्रत मांएं बेटों के लिए भी करती हैं. यदि मांएं और पिता दोनों ही बेटियों के लिए भी व्रत करते और पति भी पत्नी की लंबी उम्र और अच्छे स्वास्थ्य के लिए व्रत करते तब क्या इसे ज्यादा स्वस्थ और अनोखी परंपरा नहीं माना जाता? हालांकि आजकल कुछ पत्नीसंवेदी पति, पत्नियों का साथ देने के लिए निर्जला व्रत करने लगे हैं पर यह उनका व्यक्तिगत फैसला है.

यह अजीब विडंबना है कि करवाचौथ जैसा घोर लिंगभेदी कर्मकांड ऐसे दौर में ज्यादा प्रचलित हो रहा है, जब लैंगिक समानता की दावेदारी भी बढ़ रही है. शिक्षा का स्तर तेजी से बढ़ने और लिंगभेद के प्रति सचेत होने के बावजूद भी मांएं, बेटों और पतियों के लिए व्रत करने से नहीं चूकतीं. हद तो यह है कि ऐसे व्रत न करने पर वे खुद को दोषी जैसा महसूस करती हैं. यदि उन्हें कभी व्रत न करने का अपराधबोध महसूस न हो तो हमारा समाज पूरी निष्ठा से उन्हें यह महसूस करवा देता है.

पति या बेटे के लिए व्रत न रखने पर महिलाओं को अपराधबोध महसूस करवाने में समाज अकेला नहीं है, उसका साथ देने के लिए बाजार भी है. बाजार के पास सच में कोई अमोघ शस्त्र है, जिससे वह हर किसी की सोचने-समझने की शक्ति खत्म कर देता है. वरना क्या कारण है कि अपनी पहचान और समानता के हक के लिए इतनी संवेदनशील होने के बाद भी पढ़ी-लिखी लड़कियों की नई पीढ़ी, इस लिंगभेदी कर्मकांड को छोड़ने के बजाय और ज्यादा जोश से अपना रही है? नई पीढ़ी की महिलाओं से अक्सर सुनने को मिलता है – ‘इस व्रत को करके हमें भीतर से बहुत अच्छा लगता है, या शांति मिलती है या ख़ुशी होती है.’ पुरुषों के सामान हकों के लिए संघर्ष करने वाली लड़कियों/महिलाओं का तो बेटों और पतियों के नाम पर किये जाने वाले व्रतों के बारे में सुनकर ही खून खौलना चाहिए था, क्योंकि ऐसे तमाम व्रत पुरुषों को स्त्री से श्रेष्ठ, ज्यादा कीमती और ज्यादा जरूरी ठहराते हैं!

हिंदू धर्म में सिर्फ बेटों और पतियों के लिए ही व्रत का प्रावधान है. बेटियों, मांओं और पत्नियों के लिए नहीं. यह सीधे-सीधे लिंगभेदी परंपरा है जिसे धर्म पोषित करता है

एक यही दिन है जब खांटी से खांटी पति भी अपनी मर्दानगी को थोड़ी देर के लिए दबाकर, अपनी पत्नी के लिए ज्यादा से ज्यादा संवेदनशील, सहायक, विनम्र, और हंसमुख बन जाते हैं. सिर्फ इसी दिन क्यों? क्या सालभर उन्हें अपनी पत्नियों का उनके लिए किया गया अंतहीन श्रम, खटना, सेवा और लगाव नहीं दिखता? पत्नियों के खाना-पानी छोड़े बिना वे उनके प्रति ज्यादा संवेदनशील क्यों नहीं रह सकते?

यहां सवाल पुरुषों के साथ-साथ स्त्रियों पर भी उठने चाहिए. ज्यादातर मामलों में पत्नियों के लिए भी यह एक तरह से खुद को पतिव्रता सिद्ध करने का मौका होता है. यह पतिव्रता होने का प्रमाणपत्र है जिसे पत्नियां खुशी-खुशी साल-दर-साल ‘रिन्यू’ कराना चाहती हैं और जिसे पति बेहद खुशी और फख्र से जारी करते हैं.

जीवन का अंतिम सत्य तो यही है कि स्त्री-पुरुष अपने सहयोगी रूप में ही एक-दूसरे के साथ श्रेष्ठ जीवन जी सकते हैं. व्यवहार में आसानी से देखा जा सकता है कि कई बच्चों की मां, विधवा या परित्यक्ता या तलाकशुदा स्त्रियां अक्सर दूसरा विवाह नहीं करतीं. बच्चों की आर्थिक और पारिवारिक जिम्मेदारियां वे स्वयं उठा लेती हैं. शायद इसलिए कि इनमें से तकरीबन सभी पुरुषों की संवेदनहीनता की भुग्तभोगी होती हैं. वे दोबारा विवाह नहीं करना चाहतीं. इसके विपरीत विधुर या तलाकशुदा पति अक्सर ही बच्चों की देखभाल या मां-बाप की सेवा के नाम पर, जल्द से जल्द दूसरी शादी के लिए दौड़ते हैं. यानी स्त्री एक बार को नौकरी, घर व बच्चे अकेले संभाल लेती है, लेकिन पुरुष नौकरी के साथ-साथ घर व बच्चे संभालने की हिम्मत अक्सर ही नहीं कर पाते. इस हिसाब से तो पुरुषों को स्त्रियों की ज्यादा जरूरत है. लेकिन इसके बावजूद भी उन्हें कभी नहीं लगता कि अपनी पत्नियों या बेटियों के अच्छे स्वास्थ्य और लंबी उम्र की कामना के लिए निर्जल या सजल उपवास करना चाहिए.

स्त्री नौकरी, घर व बच्चे अकेले संभाल सकती है लेकिन पुरुष नौकरी के साथ-साथ घर व बच्चे संभालने की हिम्मत अक्सर ही नहीं कर पाते. इस हिसाब से तो पुरुषों को स्त्रियों की ज्यादा जरूरत है

इस मामले में भी पितृसत्ता ने बाजार की आक्रामकता को अपने हित में मोड़ लिया है. यह लिंगभेद को कायम रखने का ज्यादा असरदार तरीका है. तमाम अखबार, खबरिया चैनल, सब मिलकर करवाचौथ के व्रत को इस तरह से पेश करते हैं जैसे यह कोई राष्ट्रीय त्योहार है. देश तो छोड़िए, विदेश में रहने वाली भारतीय पत्नियां भी श्रद्धा से इस व्रत का पालन करती हैं. असल में उन्हें नहीं पता कि वे क्या कर रही हैं. वे स्वेच्छा से, खुशी-खुशी पुरुषों को अपने से ज्यादा अहम, जरूरी, महत्वपूर्ण और श्रेष्ठ मान रही हैं. अब जिस स्त्री जाति को खुद का और अपनी बेटी का जीवन इतना कीमती नहीं लगता, कि वह उसकी लंबी आयु और अच्छे स्वास्थ्य के लिए व्रत करे, तो उसके लिए लिंगभेद का शिकार बने रहने की अलग से वजह खोजे जाने की जरूरत नहीं है.

जिस रूप में करवाचौथ हमारे यहां मनाया जा रहा है, उसमें तो यह सिर्फ और सिर्फ पुरुषों का त्योहार है, जिसमें स्त्रियां खुद को उनके लिए खटाती हैं, कष्ट देती हैं. हम ऐसे किसी एक नये करवाचौथ के इंतजार में हैं, जहां पुरुष स्वेछा से अपनी पत्नियों के लिए व्रत करेंगे… या फिर पुरुष न सही, कम से कम स्त्रियां ही अपने खुद के स्वास्थ्य या लंबी उम्र की कामना कर लें.

मौर्य युग का पतन The Fall of Mauryan Era

अशोक के उत्तराधिकारी

अशोक की मृत्यु के उपरांत मौर्य साम्राज्य का इतिहास अत्यंत तिमिरावृत्त हो जाता है। उसके उत्तराधिकारियों का जो विवरण बौद्द्द, जैन, ब्राहमण ग्रंथों में में मिलता है, वह इतना अस्पष्ट और परस्पर-विरोधी हैं कि उसके आधार पर मौर्य साम्राज्य के परिवर्ती इतिहास का निर्माण करना अतीव दुष्कर कार्य प्रतीत होता है। इतना निश्चित है कि अशोक के बाद मौर्य साम्राज्य की शक्ति दिनोंदिन गिरती ही गई। ऐसा एक भी प्रतापी और पराक्रमी नरेश नहीं हुआ जो पतन की इस तीव्रगामी प्रक्रिया को रोककर अपने वंश के गौरव को प्रतिष्ठित करता। परिणाम यह हुआ कि पराक्रमी चन्द्रगुप्त मौर्य द्वारा स्थापित साम्राज्य शीघ्र ही ध्वस्त हो गया।

अशोक के पाँच पुत्रों का उल्लेख विभिन्न स्रोतों में किया गया है। इनके नाम हैं- कुणाल, तीवर, महेन्द्र, कुस्तन और जालौक। इनमें से अशोक के में परस्पर काफी अन्तर है। दिव्यावदान के अनुसार अशोक के बाद कुणाल का पुत्र सम्पदी या सम्प्रति राजा हुआ। वायु पुराण का साक्ष्य है कि अशोक के राजसिंहासन का उत्तराधिकारी उसका पुत्र कुणाल हुआ जिसने आठ वर्षों तक शासन किया। किन्तु एक अन्य अनुश्रुति उसे अन्धा बतलाती है। कहा जाता है कि उसके नेत्रों की सुन्दरता के कारण उसका नाम कुणाल पड़ा था और अपनी विमाता तिष्परक्षिता की ईष्य के कारण उसे अपने नेत्रों से हाथ धोना पड़ा था। यदि वह अन्धा था तो सम्भवत: उसकी स्थिति महाभारत के धृतराष्ट्र की सी थी और यद्यपि वह सम्राट् समझा जाता था तब भी उसकी शक्ति नाम मात्र की ही थी। शारीरिक दृष्टि से अयोग्य होने के कारण राज्य-भार उसके प्रिय पुत्र सम्प्रति को दे दिया गया जिसको बौद्ध और जैन लेखों ने अशोक का उत्तराधिकारी बतलाया है।

कुणाल के उत्तराधिकारियों के विषय में भी अनुश्रुतियाँ परस्पर-विरोधी बातें कहती हैं। वायु पुराण के अनुसार अशोक का पुत्र बन्धुपालित था। दिव्यावदान तथा जिनप्रभसूरि के पाटलिपुत्र कल्प के अनुसार वह सम्पदी या सम्प्रदी या सम्प्रती था और तारानाथ के अनुसार विगतशोक-महान् सम्राट् अशोक का पुत्र था। या तो ये राजकुमार एक ही व्यक्ति थे अथवा ये भाई थे। यदि भाई होने वाला सिद्धान्त ठीक हो तो बन्धुपालित का समीकरण दशरथ के साथ किया जा सकता है। दशरथ की ऐतिहासिकता के प्रमाण उपलब्ध हैं। दशरथ की प्रवृत्ति धर्म की ओर अधिक थी। उसने नागार्जुनी की पहाड़ियों में आजीविकों के लिए कन्दरा-गृहों का निर्माण करवाया था। इससे मालूम पड़ता है कि इस समय भी आजीविकों का सम्प्रदाय विद्यमान था। दशरथ के समय में मगध साम्राज्य से कलिंग का प्रान्त पृथक हो गया था। अभिलेखों में अशोक की भाँति दशरथ के लिए भी देवानांपिय की उपाधि का प्रयोग किया गया है। दशरथ सम्भवत: पुत्रहीन था, अतएव उसका भाई सम्प्रति उसका अधिकारी हुआ। सम्प्रति का नाम अधिकांश पौराणिक वंशावलियों में आता है। इसके अतिरिक्त जैन तथा बौद्ध लेखकों ने भी उसका उल्लेख किया है। अतएव सम्प्रति को भी ऐतिहासिक मगध का शासक मानना समीचीन जान पड़ता है। अशोक के बाद मौर्य वंश में जितने भी शासक हुए, उनमें सबसे महत्त्वपूर्ण सम्प्रति ही था। उसने मगध के सभी भागों पर अपना अधिकार बनाये रखा। डॉ. स्मिथ का कथन है कि दशरथ और सम्प्रति एक ही मगध में पश्चिमी-पूर्वी भारत में शासन कर रहे थे। स्मिथ साहब के कथनानुसार अशोक के बाद मौर्य साम्राज्य दो भागों में विभक्त हो गया था। परन्तु अनेक विद्वानों को स्मिथ की यह धारणा मान्य नहीं है। सम्भवत: सम्प्रति ने दो राजधानियों का प्रयोग किया था। उसकी एक राजधानी पाटलिपुत्र और दूसरी अवन्ति में थी। जैन ग्रन्थों में सम्प्रति को सम्पूर्ण भारत का राजा कहा गया है। बौद्ध अनुश्रुति में जो स्थान अशोक का है वही जैन अनुश्रुति में सम्प्रति का है। सम्प्रति ने जैन धर्म को राजाश्रय प्रदान किया था और जिनप्रभसूरि के अनुसार वह एक महान् अर्हन्त था जिसने अनार्य देशों में भी श्रमणों के लिए विहार बनवाये थे।

सम्प्रति के बाद मौर्य वंश का इतिहास और भी अधिक अन्धकारमय है। किन्तु सम्भवत: यह बात ठीक जान पड़ती है कि बृहद्रथ मौर्य वंश का अन्तिम सम्राट् था। यह विलासी और अकर्मण्य था और सेना के सम्पर्क से सर्वथा विलग रहता था। फलत: उसके सेनापति पुष्यमित्र शुंग ने सेना के सामने ही उसका वध कर दिया और मौर्य- साम्राज्य पर अपना अधिकार स्थापित कर लिया।

मौर्य युग का पतन

भारतीय इतिहास में मौर्य युग का अपना महत्त्व है। मौर्य युग में प्रथम बार भारत को सशक्त राजनैतिक एकता से बाँधने का प्रयास किया गया। मौर्य युग के लिए सुविख्यात है। उसे चन्द्रगुप्त मौर्य जैसे सम्राट्, चाणक्य जैसे कूटनीतिज्ञ तथा सम्राट् अशोक जैसे लोक कल्याणकारी शासक मिले। मौर्य युग से ही भारत के क्रमबद्ध राजनैतिक इतिहास का प्रारम्भ होता है। मौर्य युग में धर्म, दर्शन, साहित्य, कला इत्यादि के क्षेत्र में अनेक कीर्तिमान स्थापित किए। किन्तु कतिपय कारणों से मौर्य साम्राज्य भी इतिहास की सामग्री बनकर अतीत की गर्त्त में चला गया

गांव के एक ठो पत्रकार की पाती अपने दद्दू को

सड़क छाप : एक ठो पत्रकार का एक ठो पत्र हमारी अब तक की सबसे शानदार स्टोरी थी मंत्री जी के कुत्ते के खो जाने के बारे में। सारे पुलिस वाले लाइन पे आ गए थे। गंदे गरीब लोगों की स्टोरी करना हमें पसंद नहीं है दद्दू, अपने अपने टेस्ट की बात है, हाँ नहीं तो ।
प्यारे दद्दू, हम हियाँ एकदम ठीक हैं। घर से चलते बखत आप हमसे बोले थे कि बेटा वैज्ञानिक बन जाना, टीचर बन जाना, अधिकारी बन जाना, डॉक्टर बन जाना। हमने कोशिश की कि कम्प्यूटर इन्जीनियर बन जाएँ, होटल मेनेजर बन जाएँ, मुनीम बन जाएँ, लेकिन कुछ भी न बन पाए दद्दू, हम कुछ भी न बन पाए। हमें ये एहसास हो गया था दद्दू कि हम कुछऊ करने के लायक नहीं हैं। इसलिए हम पत्रकार बन गए हैं दद्दू। आप जमीन की क़िस्त के लिए जो पईसा भेजे थे उस से नया मोबाइल फ़ोन खरीद लिए हैं। हमें ये आइडिया बढ़िया लगा। पैसा खर्च का खर्च हुई गया और हाथ के हाथ में रहा। ये पत्रकारिता बड़ा गज्जब का काम है दद्दू। बहुत मजा आ रहा है। हमने सुना है कि एक ठो टाइम था जब लोग इस पेशे को दुनिया को बदलने के लिए चुनते थे। चाहे उनकी जेब में पईसे नहीं होते थे, लेकिन गलत को सही करने का, गरीब की आवाज उठाने का, जूनून होता था। हमें बड़ी खुसी हुई दद्दू, ये जान के कि वो मनहूस टाइम अब ख़तम हुई गया है। हमारा ऑफिस अन्दर से बिलकुल उस थ्री स्टार होटल के जईसा लगता है जिसमें हमने गुडिया का रिसेप्शन करवाया था। हमाये पास अपना पर्सनल क्यूबिकल है, और अब तो गाड़ी भी है, ठीक वैसी जैसी नन्हे चाचा ने ज़िन्दगी भर काम कर के रिटायरमेंट के पहले खरीदी थी। उनको उत्ता टाइम लगा, देखो हमें इत्ता टाइम लगा। हमाये पास अपना कंप्यूटर है। पत्रकारिता का काम बिलकुल आसान है, दद्दू। हम दिन भर टाइम पास करते रहते हैं, दफ्तर में इधर की उधर करते रहते हैं और चाय सुड़कते रहते हैं। उत्ती अच्छी नहीं होती जित्ती अम्मा के हाथ की चाय होती थी लेकिन मुफ्त की होती है ना! पत्रकारिता में आके हमने सबसे बड़ा ज्ञान ये पाया है की मुफ्त का चन्दन, घिस मेरे लल्ला, मुफ्त का चन्दन घिस मेरे लल्ला। दिन भर हमारे पास प्रेस विज्ञप्ति आती रहती है और हम मेज़ पे टांग धरे बैठे रहते हैं। शाम को जो हबर हमें लिखने को दी जाती है, उसकी प्रेस विज्ञप्ति से हैडलाइन काट के पूरी ज्यों की त्यों नक़ल कर लेते हैं, बस! और ज्यादा काम करने का मूड हुआ तो टीवी देख देख के दो चार खबर टीप लेते हैं। नए जमाने का रिपोर्टर रिपोर्टिंग करने गाँव शेहेर चला गया तो उसकी हनक बनेगी क्या, दद्दू? हम कोई फालतू हैं क्या? पत्रकारिता के बारे में सबसे बढ़िया बात ये है दद्दू, की हमने अपनी अकल से सोचना बंद कर दिया है। हमारी अब तक की सबसे शानदार स्टोरी थी मंत्री जी के कुत्ते के खो जाने के बारे में। सारे पुलिस वाले लाइन पे आ गए थे। गंदे गरीब लोगों की स्टोरी करना हमें पसंद नहीं है दद्दू, अपने-अपने टेस्ट की बात है, हाँ नहीं तो । आप हमारे खाने पीने की एकदम चिंता मत करियेगा दद्दू। हम अपना पूरा ख्याल रख रहे हैं। हम पूरी-पूरी कोशिश करते हैं कि अगर मन मार के दफ्तर से निकलना भी पड़े तो ऐसी प्रेस कांफ्रेंस में जाएँ जो या तो लंच के टाइम या डिनर के टाइम हो और जहाँ गिफ्ट भी मिल रही हो। हमें लग रहा है हम इस लाइन में बहुत आगे जायेंगे दद्दू। बस आपका आशीर्वाद रहे। बाकी हम किला फ़तेह कर के दिखायेंगे। आपका सुपुत्र

प्यारे दद्दू, हम हियाँ एकदम ठीक हैं। घर से चलते बखत आप हमसे बोले थे कि बेटा वैज्ञानिक बन जाना, टीचर बन जाना, अधिकारी बन जाना, डॉक्टर बन जाना। हमने कोशिश की कि कम्प्यूटर इन्जीनियर बन जाएँ, होटल मेनेजर बन जाएँ, मुनीम बन जाएँ, लेकिन कुछ भी न बन पाए दद्दू, हम कुछ भी न बन पाए। हमें ये एहसास हो गया था दद्दू कि हम कुछऊ करने के लायक नहीं हैं। इसलिए हम पत्रकार बन गए हैं दद्दू। आप जमीन की क़िस्त के लिए जो पईसा भेजे थे उस से नया मोबाइल फ़ोन खरीद लिए हैं। हमें ये आइडिया बढ़िया लगा। पैसा खर्च का खर्च हुई गया और हाथ के हाथ में रहा। ये पत्रकारिता बड़ा गज्जब का काम है दद्दू। बहुत मजा आ रहा है। हमने सुना है कि एक ठो टाइम था जब लोग इस पेशे को दुनिया को बदलने के लिए चुनते थे। चाहे उनकी जेब में पईसे नहीं होते थे, लेकिन गलत को सही करने का, गरीब की आवाज उठाने का, जूनून होता था। हमें बड़ी खुसी हुई दद्दू, ये जान के कि वो मनहूस टाइम अब ख़तम हुई गया है। हमारा ऑफिस अन्दर से बिलकुल उस थ्री स्टार होटल के जईसा लगता है जिसमें हमने गुडिया का रिसेप्शन करवाया था। हमाये पास अपना पर्सनल क्यूबिकल है, और अब तो गाड़ी भी है, ठीक वैसी जैसी नन्हे चाचा ने ज़िन्दगी भर काम कर के रिटायरमेंट के पहले खरीदी थी। उनको उत्ता टाइम लगा, देखो हमें इत्ता टाइम लगा। हमाये पास अपना कंप्यूटर है। पत्रकारिता का काम बिलकुल आसान है, दद्दू। हम दिन भर टाइम पास करते रहते हैं, दफ्तर में इधर की उधर करते रहते हैं और चाय सुड़कते रहते हैं। उत्ती अच्छी नहीं होती जित्ती अम्मा के हाथ की चाय होती थी लेकिन मुफ्त की होती है ना! पत्रकारिता में आके हमने सबसे बड़ा ज्ञान ये पाया है की मुफ्त का चन्दन, घिस मेरे लल्ला, मुफ्त का चन्दन घिस मेरे लल्ला। दिन भर हमारे पास प्रेस विज्ञप्ति आती रहती है और हम मेज़ पे टांग धरे बैठे रहते हैं। शाम को जो हबर हमें लिखने को दी जाती है, उसकी प्रेस विज्ञप्ति से हैडलाइन काट के पूरी ज्यों की त्यों नक़ल कर लेते हैं, बस! और ज्यादा काम करने का मूड हुआ तो टीवी देख देख के दो चार खबर टीप लेते हैं। नए जमाने का रिपोर्टर रिपोर्टिंग करने गाँव शेहेर चला गया तो उसकी हनक बनेगी क्या, दद्दू? हम कोई फालतू हैं क्या? पत्रकारिता के बारे में सबसे बढ़िया बात ये है दद्दू, की हमने अपनी अकल से सोचना बंद कर दिया है। हमारी अब तक की सबसे शानदार स्टोरी थी मंत्री जी के कुत्ते के खो जाने के बारे में। सारे पुलिस वाले लाइन पे आ गए थे। गंदे गरीब लोगों की स्टोरी करना हमें पसंद नहीं है दद्दू, अपने-अपने टेस्ट की बात है, हाँ नहीं तो । आप हमारे खाने पीने की एकदम चिंता मत करियेगा दद्दू। हम अपना पूरा ख्याल रख रहे हैं। हम पूरी-पूरी कोशिश करते हैं कि अगर मन मार के दफ्तर से निकलना भी पड़े तो ऐसी प्रेस कांफ्रेंस में जाएँ जो या तो लंच के टाइम या डिनर के टाइम हो और जहाँ गिफ्ट भी मिल रही हो। हमें लग रहा है हम इस लाइन में बहुत आगे जायेंगे दद्दू। बस आपका आशीर्वाद रहे। बाकी हम किला फ़तेह कर के दिखायेंगे। आपका सुपुत्र

आखिर आजादी के 70 वर्षों बाद भी ओबीसी समाज अपना हक क्यों नहीं प्राप्त कर पाया?

ओबीसी का बहुलांश हिस्सा न केवल सामाजिक-शैक्षणिक तौर पर पिछड़ा है, बल्कि संपत्ति और साधन विहीन भी है। इस समुदाय के एक बडे हिस्से के पास कोई हुनर भी नहीं है। आजादी के बाद निरंतर इसकी उपेक्षा हुई, इसके कारण क्या हैं, इस पर रोशनी डाली है, पी.एस. कृष्णनन ने :

सामाजिक समता और सामाजिक न्याय के पक्षधर सभी व्यक्तियों के मन में यह प्रश्न कौंधता है कि आखिर आजादी के 70 सालों बाद भी पिछड़ा वर्ग अपना हक क्यों नहीं प्राप्त कर सका। आज का पिछड़ा वर्ग ही मनुवादी व्यवस्था के भीतर शूद्र वर्ग है। हमेशा यह देश की आबादी का बहुसंख्यक वर्ग रहा है। मंडल आयोग के अनुसार भी यह तबका कुल आबादी का 52 प्रतिशत है। आज की जनसंख्या के आधार पर देखा जाए, तो इसकी कुल संख्या कम से कम से कम 75 करोड़ है। पिछड़ा वर्ग क्यों अपना हक नहीं प्राप्त कर सका, और आज इस वर्ग की स्थिति क्या है? यही सवाल हमने भारत सरकार के पूर्व सचिव पी.एस. कृष्णनन से पूछा।

उन्होंने अत्यन्त बेचैनी से कहा कि आजादी के तुरंत बाद यह वर्ग अपने हक के लिए संघर्ष में चूक गया। संविधान की धारा 340 में सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछ़डे वर्ग के रूप में इस तबके का जिक्र तो हुआ, इसके लिए विशेष प्रावधान और उपाय करने की चर्चा तो हुई, लेकिन वास्तव में हुआ कुछ नहीं। इस धारा में यह प्रावधान था कि राष्ट्रपति एक कमीशन नियुक्ति करेंगे। यह कमीशन ओबीसी जातियों की पहचान करेगा। कमीशन की रिपोर्ट के आधार पर ओबीसी जातियों को प्रतिनिधित्व के लिए उचित कदम सरकार उठायेगी।

23 जनवरी 1953 को पिछड़ी जातियों की पहचान और विविध क्षेत्रों में उनको उचित प्रतिनिधित्व देने की सिफारिश करने के लिेए काकाकालकेर आयोग का गठन किया गया। इस आयोग ने 30 मार्च 1955 को अपनी रिपोर्ट दी। आयोग की सिफारिशों को लागू करने से नेहरू की सरकार ने इंकार कर दिया। असंगठित और नेतृत्वविहीन पिछड़ी जातियां कोई कारगर प्रतिरोध नहीं कर पाईं।

जनता पार्टी की सरकार आने पर जब पिछड़ी जातियों के नेताओं ने दबाव डाला तो, बिंदेश्वरी प्रसाद मंडल के नेतृत्व में एक नया आयोग बना। जिसे मंडल आयोग कहा गया। इसने 31 दिसंबर 1980 को अपनी रिपोर्ट पेश किया। इस रिपोर्ट को भी ठण्डे बस्ते में डाल दिया गया। लगभग 10 सालों बाद 7 अगस्त 1990 को वी.पी. सिंह ने मंडल आयोग की कुछ सिफारिशों को लागू करने का निर्णय लिया। कथित उच्च जातियों की ओर से ऐसी प्रतिक्रिया आई, जैसे कोई भूचाल आ गया हो। दो वर्षों तक इसे लागू होने से सर्वोच्च न्यायालय ने रोके रखा। आखिरकर 16 दिसंबर 1992 को सरकारी नौकरियों में ओबीसी के लिए 27 प्रतिशत आरक्षण लागू हुआ। इस प्रकार लगभग 42 वर्षों तक ओबीसी समुदाय आरक्षण से पूर्णतया वंचित रहा। उच्च शिक्षा संस्थानों ओबीसी के लिए आरक्षण 2006 में जाकर लागू। पिछड़ों जातियों के लिए संवैधानिक दर्जा प्राप्त आयोग अभी तक नहीं बन पाया।

आखिर पिछड़ा वर्ग अपना बाजिब हक क्यों नही प्राप्त कर सका? उसे बहुत थोड़ा हक, इतनी देर से क्यों प्राप्त हुआ, क्यों वह इस मामले में दलितों से भी पीछे छूट गया?

इसका कारण बताते हुए पी.एस. कृष्णनन कहते हैं कि पहली बात यह कि उत्तर भारत में आजादी के पहले और बाद कोई ऐसा सशक्त नेता नहीं था, जो सभी पिछड़ी जातियों को एकजुट कर उनके हक-हकूक के लिए आवाज उठा सके। संगठन और नेतृत्व का अभाव ही वह मुख्य कारण है, जिसके चलते इस वर्ग की जातियां अपने बाजिब हक प्राप्त नहीं कर सकी। वे याद दिलाते हैं कि दक्षिण भारत में स्थिति इससे भिन्न थी। वहां प्रभावकारी नेतृत्व और आपसी एकता दोनों थी। जिसके चलते वहां पिछड़ों के लिए आरक्षण आजादी के काफी पहले ही लागू हो गया। कोल्हापुर ने 1902 मेें ही पिछड़ों के लिए आरक्षण लागू कर दिया था। बाद में बाम्बे प्रेसीडेंसी में भी आरक्षण लागू हुआ। इस बात-चीत के दौैरान वह यह भी कहना नहीं भूलते हैं कि जो लोग कहते हैं कि आरक्षण से काम की गुणवत्ता गिरती है, उन्हें दक्षिण के राज्यों के अनुभव पर ध्यान देना चाहिए, जहां आजादी के बहुत पहले से आरक्षण लागू है, आजादी के बाद 50 प्रतिशत आरक्षण दक्षिण के कई राज्यों में (तमिलनाडु में 50 प्रतिशत से भी अधिक) उत्तर भारत से काफी पहले लागू हो गया था। दक्षिण के राज्य हर मामले में उत्ततर भारत से आगे हैं।

कृष्णनन चेताते हैं कि एकता, संघर्ष और सशक्त नेतृत्व के बिना पिछड़ी जातियां अपना वाजिब हक प्राप्त नहीं कर पायेंगी, उच्च जातियों के बराबर नहीं उठ पायेगीं। वे यह भी कहते हैं कि पिछड़ी जातियों के उत्थान और सशक्तीकरण के बिना भारत में न्यायपूर्ण समाज की स्थापना की कल्पना भी नहीं की जा सकती है।